परिजनों ने पुलिस पर फर्जी मुठभेड़ का लगाया आरोप, जन आक्रोश के बाद बिहार सरकार ने रिटायर्ड हाईकोर्ट जज से जांच के दिए आदेश
अंकित शर्मा, ANCवार्ता।
पटना/भोजपुर। भोजपुर जिले के बेलौटी क्षेत्र में हुए चर्चित भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले ने बिहार की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। मुठभेड़ में भरत भूषण तिवारी की मौत के बाद परिजनों, स्थानीय लोगों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने घटना पर गंभीर सवाल उठाए हैं। बढ़ते जन आक्रोश और पुलिस कार्रवाई पर उठ रही शंकाओं के बीच बिहार सरकार ने मामले की न्यायिक जांच कराने का फैसला किया है। सरकार ने उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र जांच के आदेश दिए हैं।
मामले का सबसे विवादित पहलू यह है कि मृतक के परिजनों और कुछ कथित चश्मदीदों का दावा है कि भरत भूषण तिवारी ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था। आरोप है कि उन्होंने अपना हथियार फेंक दिया था और गिरफ्तारी के लिए तैयार थे, लेकिन इसके बावजूद पुलिस ने उन्हें गोली मार दी। परिजनों का कहना है कि यह कोई वास्तविक मुठभेड़ नहीं थी, बल्कि जानबूझकर की गई कार्रवाई थी।
दूसरी ओर पुलिस का दावा पूरी तरह अलग है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार भरत भूषण तिवारी एक वांछित अपराधी था और पुलिस टीम पर फायरिंग की गई थी। पुलिस का कहना है कि आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई की गई, जिसमें वह घायल हुआ और बाद में उसकी मौत हो गई। पुलिस ने इसे वैधानिक और परिस्थितियों के अनुरूप कार्रवाई बताया है।
घटना के बाद सबसे अधिक चर्चा बिहार सरकार और पुलिस प्रशासन के बयानों में दिखाई दिए विरोधाभास को लेकर हुई। मामले पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शुरुआती प्रतिक्रिया में कहा था कि भरत भूषण तिवारी को गिरफ्तार कर लिया गया है। वहीं दूसरी तरफ पुलिस लगातार यह कहती रही कि आरोपी एनकाउंटर में मारा गया। दोनों बयानों में अंतर सामने आने के बाद विपक्ष और सामाजिक संगठनों ने सरकार और पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने शुरू कर दिए।
जनता के बीच यह सवाल तेजी से उठने लगा कि यदि आरोपी को गिरफ्तार किया गया था तो उसकी मौत कैसे हुई, और यदि वह मुठभेड़ में मारा गया था तो मुख्यमंत्री को गलत जानकारी क्यों दी गई। इन सवालों ने पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया।
भोजपुर और आसपास के क्षेत्रों में घटना को लेकर विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिले। स्थानीय लोगों ने निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए पुलिस प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की। बढ़ते दबाव के बीच शाहाबाद रेंज के डीआईजी ने प्रारंभिक कार्रवाई करते हुए संबंधित थाना प्रभारी समेत कई पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया। प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए की गई है।
विवाद बढ़ने के बाद बिहार सरकार ने मामले की न्यायिक जांच की घोषणा की। सरकार का कहना है कि न्यायिक जांच से घटना की सच्चाई सामने आएगी और यह स्पष्ट हो सकेगा कि पुलिस कार्रवाई नियमों के अनुरूप थी या नहीं। जांच में सभी पक्षों के बयान दर्ज किए जाएंगे और उपलब्ध वीडियो, दस्तावेजों तथा अन्य साक्ष्यों की भी पड़ताल की जाएगी।
राजनीतिक दलों ने भी इस मामले को लेकर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं। विपक्ष ने सरकार पर कानून व्यवस्था और पुलिस जवाबदेही को लेकर सवाल उठाए हैं, जबकि सरकार का कहना है कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा और जांच रिपोर्ट के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
फिलहाल पूरे बिहार की नजर न्यायिक जांच पर टिकी हुई है। परिजन न्याय की मांग कर रहे हैं, जबकि प्रशासन निष्पक्ष जांच का भरोसा दिला रहा है। अब यह जांच ही तय करेगी कि बेलौटी एनकाउंटर एक वैध पुलिस कार्रवाई थी या फिर परिजनों द्वारा लगाए जा रहे आरोपों में कितनी सच्चाई है। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही इस बहुचर्चित मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकेगी।

