देश के सबसे तेजी से उभरते राज्य में ग्राम प्रधानी का चुनाव
डॉ. अनुज, स्तंभकार
उत्तर प्रदेश इस समय विकास की नई कहानी गढ़ रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति कर रहा है। इसी बीच प्रदेश में एक महत्वपूर्ण चुनाव होने जा रहा है—ग्राम प्रधानी का चुनाव, जिसे हम पंचायत चुनाव भी कहते हैं। यह चुनाव न तो लोकसभा का है, न ही विधानसभा या विधान परिषद का, बल्कि यह ग्रामीण भारत के हृदय से जुड़ा हुआ लोकतांत्रिक पर्व है। इसमें ग्रामीण मतदाता खुद को अन्य चुनावों से कहीं अधिक जुड़ा महसूस करता है, क्योंकि इसका सीधा असर उनके गांव और समुदाय के भविष्य पर पड़ता है। ग्राम पंचायत, भारत के ग्रामीण स्थानीय स्वशासन की सबसे बुनियादी इकाई है। इसका काम है गांव के लोगों के साथ मिलकर विकास की दिशा तय करना और समस्याओं का समाधान खोजना। पंचायतें लोकतंत्र के मूल सिद्धांत—विकेंद्रीकरण—को व्यवहार में उतारती हैं।
भारत में लोकतंत्र तीन स्तरों पर चलता है—पहला संसदीय चुनाव, दूसरा विधानसभा चुनाव और तीसरा पंचायत स्तर का चुनाव। इन तीनों में पंचायत चुनाव सबसे नजदीकी और प्रत्यक्ष लोकतंत्र का अनुभव कराता है, जहां जनता अपने प्रतिनिधि को न केवल चुनती है बल्कि सीधे संवाद भी कर सकती है। उत्तर प्रदेश में आज जब विकास और परिवर्तन की नई इबारतें लिखी जा रही हैं, तब यह पंचायत चुनाव न केवल स्थानीय शासन की दिशा तय करेगा, बल्कि आने वाले वर्षों में गांवों के सामाजिक और आर्थिक परिदृश्य को भी आकार देगा। आज उत्तर प्रदेश की तस्वीर बदल चुकी है। अपवाद स्वरूप घटनाओं को छोड़ दें तो संगठित अपराध के बड़े-बड़े आकाओं का या तो अंत हो चुका है या वे शराफत की राह पकड़ने को मजबूर हो गए हैं। कानून-व्यवस्था में इस सुधार का सीधा असर जनता के मनोबल पर दिखाई देता है। यही वजह है कि इस पंचायत चुनाव में एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है। जो लोग कभी सरकार, सत्तारूढ़ पार्टी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम पर नकारात्मक बातें फैलाते थे, वही अब चुनाव से पहले उनकी तारीफ के पुल बांधते नजर आ रहे हैं। जनमानस में योगी जी के प्रति सम्मान इतना बढ़ा है कि विरोधी भी अब विकास कार्यों को खुलकर स्वीकार कर रहे हैं। यह बदलाव केवल राजनीतिक रुझान का नहीं, बल्कि प्रदेश की बदलती कार्यसंस्कृति और जनविश्वास का संकेत है। पंचायत चुनाव सिर्फ एक स्थानीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि यह भारत के लोकतंत्र का सबसे बुनियादी और जीवंत चेहरा है। यह चुनाव सीधे तौर पर ग्रामीण जनमानस के भविष्य को आकार देता है। यहां हर वोट न केवल एक व्यक्ति को चुनता है, बल्कि पूरे गांव की दिशा और दशा तय करता है।
सवाल यह है कि भविष्य कौन तय करेगा? चुनाव में प्रतिनिधि का भाग्य तो मतदाता के हाथ में है, लेकिन नतीजे आने के बाद गांव की नीतियां, योजनाएं और विकास की प्राथमिकताएं उसी चुने हुए प्रतिनिधि के फैसलों पर निर्भर करती हैं। इसीलिए जागरूक और सही चयन ही असली बदलाव की कुंजी है।
ग्राम पंचायत के प्रतिनिधि में केवल औपचारिक योग्यता या राजनीतिक अनुभव ही नहीं, बल्कि ऐसे गुण होने चाहिए जो उसे वास्तव में जनता का नेता बनाएं। सबसे महत्वपूर्ण है—उसकी जनता तक पहुँच। एक आदर्श पंचायत प्रमुख वह है जो गांव के लोगों से सीधे संवाद के लिए आसानी से उपलब्ध हो। यदि कोई प्रतिनिधि जनता से मिलने के लिए केवल सहायकों या मध्यस्थों पर निर्भर करता है, खुद को वीआईपी समझता है और आम लोगों को कई बार चक्कर लगवाने के बाद ही मिलने आता है, तो यह सोचने की बात है। पंचायत स्तर के मुखिया को सुलभ, सहज और जनता के बीच रहने वाला होना चाहिए—क्योंकि यही असली जनप्रतिनिधि की पहचान है। एक जनप्रतिनिधि में अच्छे व्यवहार और बुनियादी गुणों के साथ कुछ अतिरिक्त विशेषताएं भी होनी चाहिए। बदलते समाज और बदलती दुनिया में प्रतिनिधि का सिर्फ साक्षर होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका शिक्षित और जागरूक होना बेहद जरूरी है। गांवों में कई बार ऐसे प्रतिनिधि देखने को मिलते हैं जो पहले दूध, किराना या छोटे-मोटे व्यवसाय से जीवन यापन करते थे। बिना व्यापक अनुभव या नौकरी के, उन्हें लगता है कि वे पूरी तरह सक्षम हैं। ऐसे लोग अक्सर शिक्षा को कम महत्व देते हैं। वे न तो मेधावी छात्रों को प्रोत्साहित करते हैं, न ही प्रतिभाशाली युवाओं की उपलब्धियों की सराहना करते हैं। उल्टा, कभी-कभी वे अपने कम पढ़े-लिखे बच्चों को जबरदस्ती आदर्श के रूप में पेश करते हैं और दूसरों के योग्य बच्चों का मनोबल गिराते हैं। ऐसे प्रतिनिधियों के बारे में मतदाता को गंभीरता से विचार करना चाहिए, क्योंकि शिक्षा और दूरदृष्टि के बिना नेतृत्व गांव के विकास को सीमित कर देता है। गांव की राजनीति में एक विचित्र प्रवृत्ति देखने को मिलती है—कुछ लोग खुद को “प्रधान”, “सरपंच” या “मुखिया” कहलवाने में गर्व महसूस करते हैं, जबकि हकीकत यह होती है कि पद पर उनकी पत्नी, बेटी या कोई अन्य रिश्तेदार वैध रूप से आसीन होता है। ऐसे लोग असल में पद के पीछे छिपे ‘अनौपचारिक संचालक’ होते हैं। अकादमिक शोध और न्यायालयों में इन्हें “प्रधान पति” या “सरपंच पति” कहा जाता है। इनका असर समाज के लिए घातक होता है, क्योंकि ये नेतृत्व का दिखावा करते हुए गांव को आगे बढ़ाने के बजाय पीछे धकेलते हैं। जो व्यक्ति अपने घर और परिवार में महिलाओं को सम्मानजनक स्थान नहीं दे सकता, वह समाज को सही दिशा देने की क्षमता भी नहीं रखता। ऐसे लोग विकास की राह में केवल झूठ और भ्रम का सहारा लेते हैं। किसी भी प्रतिनिधि का असली मूल्यांकन उसके विज़न और मिशन से होता है। यह देखना जरूरी है कि वह गांव के भविष्य को लेकर क्या सोच और योजना रखता है। क्या उसने कभी गांव के शिक्षित लोगों या युवाओं के साथ बैठकर विचार-विमर्श किया है? क्या उसने विकास के लिए सामूहिक राय ली है? या फिर वह केवल चुनावी मौसम में सक्रिय होने वाला “बरसाती मेंढक” है, जो मनमर्जी से कुछ चुनिंदा लोगों के पास जाता है और बाकी समय गांव की जरूरतों से बेखबर रहता है। ऐसे रवैये से गांव की प्रगति रुकती है और लोकतंत्र का असली मकसद अधूरा रह जाता है। यह भी परखना जरूरी है कि आपके क्षेत्र का प्रतिनिधि राजनीतिक रूप से कितना परिपक्व है। क्या वह संकीर्ण मानसिकता का शिकार है? उदाहरण के लिए—जो व्यक्ति सिर्फ इसलिए किसी से बात न करे क्योंकि वह उसके खिलाफ चुनाव लड़ने की सोच रहा है, या उसके समर्थकों से भी दूरी बना ले—तो यह लोकतांत्रिक आचरण नहीं है। देश की संसद में भी राजनीतिक विरोधी एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते हैं। लेकिन अगर कोई प्रतिनिधि षड्यंत्रकारी गोलबंदी में विश्वास रखता है, तो समझ लीजिए कि वह राजनीति नहीं बल्कि ‘सड़कछाप नीति’ कर रहा है। ऐसा व्यक्ति, जिसने अपना अधिकतर जीवन केवल जिले की सीमाओं में बिताया हो और जिसे व्यापक भौगोलिक व सांस्कृतिक अनुभव न हो, अक्सर क्षेत्र में वैमनस्य ही फैलाता है। सहयोगी रवैया उसके स्वभाव का हिस्सा नहीं होता। गांव के विकास का असली पैमाना यह भी है कि वहां के प्रतिनिधि ने शिक्षा और कौशल विकास पर, चाहे औपचारिक रूप से या अनौपचारिक रूप से, कितना ध्यान दिया। क्या उसने युवाओं को नई तकनीक, रोज़गार के अवसर और प्रशिक्षण से जोड़ा? या फिर वह इन बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज करता रहा? इसके साथ ही यह भी देखना जरूरी है कि गांव के पुराने सामाजिक व्यवहार में कितनी सकारात्मक बदलाव की पहल हुई। उदाहरण के तौर पर, कुछ पुरानी आदतें—जैसे किसी से अभिवादन न करना, या नमस्ते-सलाम का जवाब न देना—सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हैं। एक सच्चा जनप्रतिनिधि इन छोटी-छोटी लेकिन महत्वपूर्ण बातों में भी बदलाव लाकर आपसी सम्मान और सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देता है। एक मतदाता के रूप में हो सकता है किसी ने आपके मन में यह भर दिया हो कि जीवन में बदलाव आसानी से नहीं आता। लेकिन सच यह है कि इस दौर में हर जाति, धर्म और लिंग के लोग मेहनत और लगन से नई इबारत लिख रहे हैं। आपकी अपनी आने वाली पीढ़ियां भी आपके ग्रामसभा से निकलकर इतिहास रच सकती हैं, आपका नाम रोशन कर सकती हैं—बशर्ते आपके क्षेत्र का प्रतिनिधि सक्षम और दूरदर्शी हो। एक अच्छा प्रतिनिधि वही है जो गांव की सीमाओं से बाहर निकला हो, पढ़ा-लिखा हो, काम का अनुभव रखता हो, और देश के अलग-अलग हिस्सों में लोगों से जुड़ा हो। तभी वह जरूरत के समय गाव के युवा की मदद किसी अन्य राज्य में आसानी से कर पाएगा। विनम्रता और मिलनसारिता उसके व्यक्तित्व की पहचान होनी चाहिए—ताकि वह केवल राजनीति नहीं, बल्कि जीवन में भी सकारात्मक बदलाव ला सके।
आज हमारा राज्य प्रगति के पथ पर अग्रसर है। यह चुनाव एक प्रकार का लोकतांत्रिक यज्ञ है, जिसमें आपका मत सबसे महत्वपूर्ण आहुति है। इसलिए सोच-समझकर, धैर्य और विवेक के साथ मतदान करें। यह दौर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार और चालाक धूर्तों की सक्रियता—दोनों का संगम है। ऐसे समय में आम जनमानस को सतर्क रहना होगा, ताकि लोकतंत्र के इस पावन यज्ञ में आपकी आहुति केवल आज ही नहीं, आने वाले वर्षों तक राज्य के उज्ज्वल भविष्य का आधार बने।
(लेखक डॉ.अनुज स्तंभकार है।)

