Trending राजनीति राष्ट्रीय

अलविदा जंतर-मंतर: 8 साल बाद फिर बदला दिल्ली में धरना-प्रदर्शन का ठिकाना

अलविदा जंतर-मंतर: 8 साल बाद फिर बदला दिल्ली में धरना-प्रदर्शन का ठिकाना, अब इन 3 जगहों पर उठेगी आवाज

Ancवार्ता,ब्यूरो,नई दिल्ली: दिल्ली में धरना-प्रदर्शन की पहचान बन चुके जंतर-मंतर को अब निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया गया है। दिल्ली पुलिस के इस फैसले के साथ करीब आठ साल बाद एक बार फिर राजधानी में विरोध-प्रदर्शनों का ठिकाना बदल गया है। अब प्रदर्शनकारियों को अपनी मांगें उठाने के लिए रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड का रुख करना होगा।

यह बदलाव केवल प्रदर्शन की जगह बदलने तक सीमित नहीं है। इससे जहां नई दिल्ली के व्यस्त बाजारों और सड़कों पर यातायात का दबाव कम होने की उम्मीद है, वहीं प्रदर्शनकारियों के सामने बुकिंग, खर्च और सुरक्षा से जुड़ी नई चुनौतियां भी होंगी। खास बात यह है कि नए स्थलों पर एक समय में केवल एक संगठन को प्रदर्शन की अनुमति मिल सकेगी।

आठ साल बाद फिर बदला फैसला, पहले भी लग चुकी है रोक

जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों को लेकर इससे पहले भी बंदिश लगाई जा चुकी है। अक्टूबर 2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के आदेश के बाद यहां धरना-प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई थी। इस फैसले का सिविल सोसाइटी ने विरोध किया और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। इसके बाद जुलाई 2018 में प्रदर्शन पर लगी बंदिश हटा ली गई थी।

अब एक बार फिर जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से बाहर कर दिया गया है। इससे दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों के आयोजन की व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया है।

जंतर-मंतर से पहले कहां होते थे प्रदर्शन?

दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों का इतिहास काफी पुराना है। आजादी से पहले चांदनी चौक के आजाद पार्क, दरियागंज के पटौदी हाउस, टाउन हॉल क्लॉक टावर, फिरोज शाह कोटला, कश्मीरी गेट और जामा मस्जिद जैसे स्थानों पर लोग अपनी मांगों को लेकर जुटते थे।

आजादी के बाद संसद के आसपास प्रदर्शन करने का चलन बढ़ा। हालांकि, 1966 में गोरक्षा की मांग को लेकर हुए एक प्रदर्शन के हिंसक होने के बाद संसद के आसपास आम लोगों के प्रदर्शनों पर रोक लगा दी गई।

इसके बाद 1966 से 1980 के बीच रामलीला मैदान बड़े आंदोलनों का प्रमुख केंद्र बना, जबकि छोटे प्रदर्शन राजपथ स्थित बोट क्लब पर होने लगे। वर्ष 1980 के दशक में बोट क्लब पर भी बड़े प्रदर्शन हुए। किसानों के एक उग्र प्रदर्शन के बाद इस स्थान पर भी बंदिशें लग गईं। इसके बाद लाल किला और बुराड़ी जैसे स्थानों पर प्रदर्शन होने लगे।

वर्ष 1993 के बाद जंतर-मंतर विरोध-प्रदर्शनों के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा। धीरे-धीरे यह सामाजिक, राजनीतिक और जन आंदोलनों की आवाज उठाने का अहम मंच बन गया।

रामलीला मैदान: बड़े आंदोलनों का पुराना ठिकाना

रामलीला मैदान दिल्ली में बड़े आयोजनों और आंदोलनों के लिए पहले से ही जाना जाता है। यहां एक बार में करीब 50 हजार लोगों के जुटने की क्षमता है। यह दिल्ली के प्रमुख इलाकों से जुड़ा हुआ है और नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन के साथ बसों के जरिए भी यहां पहुंचा जा सकता है।

हालांकि, इस स्थान पर बड़े प्रदर्शन होने से यातायात प्रभावित होने की आशंका है। कमला मार्केट, दिल्ली गेट और आसपास के व्यस्त इलाकों में आवाजाही बाधित हो सकती है। इसका असर कनॉट प्लेस तक पहुंचने की संभावना रहती है।

रामलीला मैदान की बुकिंग के लिए निर्धारित नियमों का पालन करना होगा। इसकी बुकिंग में बदलाव करने का अधिकार एमसीडी सदन के पास है। आयोजन की लागत भी प्रदर्शनकारियों के लिए चुनौती बन सकती है।

सीबीडी ग्राउंड: पूर्वी दिल्ली में प्रदर्शन का नया विकल्प

पूर्वी दिल्ली स्थित सीबीडी ग्राउंड को भी नए प्रदर्शन स्थलों में शामिल किया गया है। कड़कड़डूमा कोर्ट के नजदीक स्थित यह मैदान दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के अधीन है। यहां करीब 50 हजार लोगों के जुटने की क्षमता बताई गई है।

सीबीडी ग्राउंड तक पहुंचने के लिए कड़कड़डूमा कोर्ट मेट्रो स्टेशन और बसों की सुविधा उपलब्ध है। यहां पार्किंग और पैदल पहुंचने के विकल्प भी मौजूद हैं। हालांकि, मैदान चारों तरफ से खुला होने के कारण बड़े प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा व्यवस्था संभालना पुलिस के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

जंतर-मंतर से इसकी दूरी करीब 12 से 13 किलोमीटर है। ऐसे में नई दिल्ली के केंद्र में स्थित प्रदर्शन स्थल की जगह पूर्वी दिल्ली तक पहुंचना कुछ प्रदर्शनकारियों के लिए अतिरिक्त समय और खर्च का कारण बन सकता है।

बुराड़ी ग्राउंड: एक लाख लोगों तक के जुटान की क्षमता

बुराड़ी ग्राउंड को बड़े प्रदर्शनों के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प माना जा रहा है। यहां करीब एक लाख लोगों के जुटने की क्षमता है, जो इसे बड़े जनसमूह वाले आयोजनों के लिए उपयुक्त बनाती है।

यह मैदान भी डीडीए के अधीन है। बुराड़ी तक पहुंचने के लिए पिंक लाइन के मेट्रो स्टेशन और आउटर रिंग रोड से चलने वाली बसों का सहारा लिया जा सकता है।

हालांकि, जंतर-मंतर से बुराड़ी ग्राउंड की दूरी लगभग 21 किलोमीटर है। इससे दूर-दराज से आने वाले प्रदर्शनकारियों को यात्रा की योजना बनानी होगी। मैदान खुला होने के कारण पुलिस को सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन और अन्य व्यवस्थाओं पर भी विशेष ध्यान देना पड़ेगा।

नए प्रदर्शन स्थलों पर बुकिंग और खर्च बनेगी बड़ी चुनौती

जंतर-मंतर पर एक साथ कई संगठन अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर सकते थे। संसद सत्र के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से संगठन यहां पहुंचते थे। लेकिन नए स्थलों पर व्यवस्था अलग होगी। एक समय में केवल एक संगठन को प्रदर्शन करने की अनुमति मिल सकेगी।

इसके अलावा, रामलीला मैदान, सीबीडी ग्राउंड और बुराड़ी में सालभर सामाजिक, धार्मिक और अन्य कार्यक्रम होते रहते हैं। ऐसे में प्रदर्शन के लिए मनचाही तारीख पर जगह मिलना आसान नहीं होगा। रामलीला मैदान में धार्मिक आयोजनों और अन्य कार्यक्रमों के कारण उपलब्धता सीमित हो सकती है। सीबीडी ग्राउंड और बुराड़ी में भी पहले से निर्धारित कार्यक्रमों के चलते तारीखों का तालमेल बैठाना जरूरी होगा।

रामलीला मैदान की बुकिंग के लिए एक दिन का शुल्क करीब 50 हजार रुपये बताया गया है। इसके अलावा 55 हजार रुपये की सुरक्षा राशि जमा करनी होती है। कर और अन्य शुल्क जोड़ने पर शुरुआती खर्च लगभग 1.21 लाख रुपये तक पहुंच सकता है। सुरक्षा राशि नियमों के अनुसार वापस की जाती है।

वहीं, सीबीडी ग्राउंड में शादियों जैसे आयोजनों का खर्च करीब एक लाख से तीन लाख रुपये तक बताया गया है। बुराड़ी ग्राउंड का शुल्क लगभग तीन हजार से पांच हजार रुपये प्रति एकड़ के बीच बताया गया है। इन खर्चों और बुकिंग की शर्तों के कारण छोटे संगठनों के लिए प्रदर्शन आयोजित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

अन्ना आंदोलन से पहलवानों के धरने तक, कई ऐतिहासिक आंदोलनों का गवाह रहा जंतर-मंतर

जंतर-मंतर ने 21वीं सदी में कई बड़े जन आंदोलनों को मंच दिया। वर्ष 2011 में अन्ना हजारे के जन लोकपाल आंदोलन ने इस स्थान को देशभर में पहचान दिलाई। पांच अप्रैल से शुरू हुए उनके अनशन में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए और भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन राष्ट्रीय बहस का प्रमुख मुद्दा बना।

दिसंबर 2012 में दिल्ली में एक युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म और बाद में उसकी मौत के बाद न्याय की मांग को लेकर देशभर में विरोध हुआ। निर्भया मामले ने महिला सुरक्षा और आपराधिक कानूनों को लेकर व्यापक बहस को जन्म दिया। जंतर-मंतर भी इस दौर में विरोध और न्याय की मांग उठाने वाले प्रमुख स्थलों में शामिल रहा।

वर्ष 2017 में तमिलनाडु के किसानों ने अपनी मांगों को लेकर यहां 41 दिनों तक धरना दिया। इसके बाद 2023 में भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर पहलवानों ने भी जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया।

हाल के वर्षों में छात्र संगठनों और युवाओं ने भी शिक्षा, चुनाव व्यवस्था तथा अन्य सार्वजनिक मुद्दों पर अपनी आवाज उठाने के लिए इस स्थान का इस्तेमाल किया। इस तरह जंतर-मंतर लंबे समय तक विभिन्न वर्गों के लिए अपनी बात सरकार तक पहुंचाने का अहम माध्यम बना रहा।

प्रदर्शन स्थल बदलने के फैसले का कारोबारियों ने किया स्वागत

जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में लगातार होने वाले प्रदर्शनों से बाजारों में कारोबार और यातायात प्रभावित होने की शिकायतें सामने आती रही हैं। कनॉट प्लेस और जनपथ के कारोबारियों ने प्रदर्शन स्थल को दूसरी जगह स्थानांतरित करने के फैसले का स्वागत किया है।

व्यापारियों के मुताबिक, प्रदर्शनों के दौरान ग्राहकों की आवाजाही कम हो जाती थी। सार्वजनिक परिवहन प्रभावित होने और मेट्रो स्टेशन बंद होने जैसी परिस्थितियों से आम लोगों, कर्मचारियों और दुकानदारों को परेशानी उठानी पड़ती थी। इसका असर बाजारों के कारोबार और राजस्व पर भी पड़ता था।

कारोबारियों का कहना है कि लोगों को लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराने का पूरा अधिकार है, लेकिन प्रदर्शन के लिए ऐसी जगह निर्धारित होनी चाहिए, जहां आम लोगों और व्यापारिक गतिविधियों पर कम से कम असर पड़े। उनके अनुसार, बुराड़ी या पूर्वी दिल्ली जैसे क्षेत्रों में प्रदर्शन होने से नई दिल्ली के बाजारों की आवाजाही सामान्य बनी रह सकती है।

रामलीला मैदान को लेकर व्यापारियों ने जताई चिंता

जहां कनॉट प्लेस और जनपथ के कुछ कारोबारियों ने जंतर-मंतर से प्रदर्शन स्थल हटाने के फैसले का समर्थन किया है, वहीं रामलीला मैदान को लेकर चिंता भी जताई गई है।

नई दिल्ली ट्रेडर्स एसोसिएशन (एनडीटीए) ने कहा है कि रामलीला मैदान पुरानी दिल्ली के प्रमुख बाजारों के काफी करीब है। यहां बड़े प्रदर्शन होने पर यातायात, ग्राहकों की आवाजाही और कारोबार प्रभावित हो सकते हैं।

व्यापारी संगठन ने मांग की है कि प्रदर्शन स्थलों का चयन करते समय आसपास के बाजारों और व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ने वाले प्रभाव को भी ध्यान में रखा जाए। संगठन के मुताबिक, प्रदर्शन के लिए अपेक्षाकृत दूर स्थान निर्धारित करने से लोगों के विरोध का अधिकार भी सुरक्षित रहेगा और बाजारों की रोजमर्रा की गतिविधियां भी कम प्रभावित होंगी।

ANC Varta

About Author

You may also like

Trending ग्रामीण भारत

कुम्हड़ा के चमत्कारिक फायदे : आपकी थाली से सेहत तक का सफर

ANCवार्ता, दिल्ली कुम्हड़ा, जिसे आम बोलचाल में कद्दू कहा जाता है, हमारे किचन की सबसे सामान्य लेकिन सबसे ताक़तवर सब्ज़ियों
ग्राउंड रिपोर्ट राष्ट्रीय

प्रेमानन्द महाराज को गले लगाएंगे रामभद्राचार्य : विवादों पर सुलह की राह

  ANC वार्ता ब्यूरो, नई दिल्ली भारतीय संत परंपरा में गुरुजन और महापुरुषों के बीच मतभेद और विवाद नए नहीं