पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गंभीर चोटों का खुलासा !
डॉ रामशंकर, संपादक, ANCवार्ता, मथुरा/वृंदावन। संत प्रेमानंद महाराज के शिष्य रसिक दुलारी शरण उर्फ दीपक लोधी की मौत का मामला लगातार चर्चा में है। वृंदावन स्थित गऊ कृपा कुंज आश्रम की चौथी मंजिल से गिरने के बाद 25 वर्षीय दीपक की मौत हुई थी। घटना के बाद से ही उनकी मौत की परिस्थितियों को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आई चोटों की जानकारी ने मामले को और गंभीर बना दिया है। हालांकि पुलिस की जांच अभी जारी है और फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है। ऐसे में जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति या संस्था को जिम्मेदार ठहराना या किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, 25 सितंबर को सुबह करीब 10:30 बजे दीपक आश्रम की चौथी मंजिल से नीचे गिरे थे। आश्रम के अन्य साधक उन्हें अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। रिपोर्ट में बताया गया है कि पुलिस को घटना की जानकारी करीब दो घंटे बाद, दोपहर लगभग 12:30 बजे अस्पताल से मिली। घटना और पुलिस को सूचना मिलने के बीच के इस अंतराल को लेकर भी जांच के दौरान सवाल उठाए जा रहे हैं।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कई गंभीर चोटों का उल्लेख
सामने आई पोस्टमार्टम संबंधी जानकारी में दीपक के शरीर पर कई चोटों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्टों के अनुसार, सिर, छाती और शरीर के अन्य हिस्सों में गंभीर चोटें पाई गईं। छाती की बाईं ओर की पांचवीं से आठवीं पसलियों के टूटने और बाएं फेफड़े में चोट का भी उल्लेख किया गया है। शरीर के भीतर रक्त और रक्त के थक्के पाए जाने की जानकारी भी रिपोर्टों में सामने आई है।
सिर के पीछे खून का थक्का और हेयरलाइन फ्रैक्चर का उल्लेख भी किया गया है। शरीर के अन्य हिस्सों में भी चोटें बताई गई हैं। इन चिकित्सकीय निष्कर्षों से घटना की गंभीरता स्पष्ट होती है, लेकिन चोटें किन परिस्थितियों में लगीं और घटना का पूरा क्रम क्या था, इसका निर्धारण पुलिस जांच और अन्य साक्ष्यों के आधार पर ही किया जा सकता है।
मृत्यु का कारण और जांच का दायरा
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गंभीर चोटों के कारण अत्यधिक रक्तस्राव और उसके परिणामस्वरूप हेमरेजिक शॉक को मृत्यु का कारण बताया गया है। हालांकि मृत्यु का चिकित्सकीय कारण सामने आना और घटना की परिस्थितियों का पूरी तरह स्पष्ट होना दो अलग-अलग बातें हैं।
यही वजह है कि पुलिस अब मामले से जुड़े अन्य साक्ष्यों को भी खंगाल रही है। पुलिस ने दीपक के मोबाइल फोन को जांच के लिए भेजा है। आश्रम में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी देखी जा रही है और वहां रहने वाले लोगों से पूछताछ की जा रही है। पुलिस के अनुसार, फॉरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद घटना की परिस्थितियों को समझने में और मदद मिल सकती है।
दो घंटे बाद पुलिस को सूचना मिलने पर सवाल
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवालों में से एक पुलिस को सूचना मिलने में हुआ कथित विलंब है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, दीपक के चौथी मंजिल से गिरने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया और वहां चिकित्सकों ने मृत घोषित किया। पुलिस को घटना की जानकारी लगभग दो घंटे बाद मिली।
यह समय अंतराल जांच का हिस्सा है। इसका कारण क्या था, घटना के तत्काल बाद कौन-कौन लोग मौके पर मौजूद थे और अस्पताल तक दीपक को किस परिस्थिति में पहुंचाया गया—इन सभी पहलुओं को जांच के दौरान स्पष्ट किया जाना आवश्यक है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर अभी इन सवालों का अंतिम उत्तर सामने नहीं आया है।
आश्रम की आंतरिक व्यवस्था भी जांच के दायरे में
रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने केवल घटना के समय और दीपक के मोबाइल रिकॉर्ड तक जांच सीमित नहीं रखी है। आश्रम में रहने वाले साधकों की दिनचर्या, बाहरी लोगों से संपर्क और आश्रम की आंतरिक व्यवस्था को भी जांच के दायरे में लिया गया है।
जांच में यह जानकारी सामने आने की बात कही गई है कि दीक्षा लेने के बाद कुछ लोगों के निजी मोबाइल फोन जमा करा लिए जाते हैं और बाद में आश्रम की व्यवस्था के तहत मोबाइल तथा सिम उपलब्ध कराए जाते हैं। समय-समय पर इन मोबाइल फोन की जांच किए जाने की जानकारी भी रिपोर्ट में दी गई है। पुलिस इस व्यवस्था और दीपक के मोबाइल रिकॉर्ड के बीच संभावित संबंधों की जांच कर रही है।
हालांकि इन व्यवस्थाओं का घटना से सीधा संबंध अभी जांच का विषय है। इसलिए किसी भी व्यवस्था को अपराध या घटना का कारण मान लेना जांच पूरी होने से पहले उचित नहीं होगा।
सीसीटीवी और फॉरेंसिक रिपोर्ट पर टिकी नजर
पुलिस के अनुसार, घटना से जुड़े सीसीटीवी फुटेज और आश्रम में मौजूद लोगों से पूछताछ महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं। दीपक का मोबाइल भी जांच के लिए भेजा गया है। फॉरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद घटनाक्रम की कड़ियों को जोड़ने में सहायता मिलने की उम्मीद है।
ऐसे मामलों में वैज्ञानिक साक्ष्य, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, डिजिटल रिकॉर्ड और अन्य जांच सामग्री महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए जांच एजेंसियों की रिपोर्ट का इंतजार करना जरूरी है।
मौत के बाद आश्रम की व्यवस्थाओं में बदलाव
रसिक दुलारी शरण की मौत के बाद आश्रम की व्यवस्थाओं में बदलाव की जानकारी भी सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, संत प्रेमानंद के शिष्यों की फाइनल दीक्षा और निर्धारित समय पर होने वाले दर्शन पर अनिश्चितकाल के लिए रोक लगाई गई है। इसके अलावा वृंदावनवास कर रहे दीक्षित शिष्यों के लिए कुछ नियमों में बदलाव किया गया है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि शिष्यों के पहनावे से जुड़े नियमों में बदलाव किया गया है और अब कई शिष्य सामान्य श्रद्धालुओं की तरह कपड़ों में दिखाई दे रहे हैं। इन बदलावों को घटना के बाद की प्रशासनिक और आश्रम संबंधी व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है।
जांच से पहले फैसला सुनाना कितना उचित?
रसिक दुलारी शरण की मौत से जुड़े तथ्य निश्चित तौर पर गंभीर हैं और प्रत्येक सवाल की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लेकिन किसी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चोटों का उल्लेख होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि चोटें किन परिस्थितियों में लगीं या उनके लिए कौन जिम्मेदार है।
यही वह बिंदु है जहां जिम्मेदार पत्रकारिता की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। मीडिया का काम सवाल उठाना, उपलब्ध तथ्यों को जनता के सामने रखना और जांच की प्रगति की जानकारी देना है; लेकिन जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता।
सनसनीखेज शीर्षक और लगातार आरोपों की पुनरावृत्ति से दर्शकों के बीच धारणा बन सकती है, जबकि वास्तविक तथ्य जांच पूरी होने के बाद ही सामने आ सकते हैं। खासकर किसी संत, आश्रम या धार्मिक संस्था से जुड़े संवेदनशील मामले में खबरों को प्रस्तुत करते समय आरोप, संदेह, जांच और सिद्ध तथ्य के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया का इंतजार जरूरी
रसिक दुलारी शरण की मौत के मामले में परिवार, आश्रम, श्रद्धालुओं और आम लोगों के बीच कई सवाल हैं। इन सवालों का जवाब निष्पक्ष और पारदर्शी जांच से ही मिल सकता है। पुलिस द्वारा मोबाइल, सीसीटीवी और अन्य साक्ष्यों की जांच की जा रही है तथा फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार है।
ऐसे में जरूरी है कि जांच एजेंसियों को अपना काम करने दिया जाए और सामने आने वाले प्रत्येक तथ्य की पुष्टि के बाद ही उसे सार्वजनिक किया जाए।
रसिक दुलारी शरण को न्याय मिलना चाहिए, हर संदिग्ध पहलू की जांच होनी चाहिए और यदि किसी की भूमिका सामने आती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जांच पूरी होने से पहले किसी को दोषी ठहराना न मृतक के प्रति न्याय होगा और न ही निष्पक्ष पत्रकारिता के अनुरूप।
सवाल पूछिए, जांच कीजिए, तथ्य सामने लाइए—लेकिन अंतिम फैसला जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर छोड़िए।

