नई परिभाषा में 100 मीटर से कम ऊँचाई वाले क्षेत्रों को ‘पहाड़ी’ न मानने पर विवाद; पर्यावरणविदों का दावा—इससे अरावली का 60% क्षेत्र असुरक्षित, खनन और निर्माण को बढ़ावा मिलेगा
ANC वार्ता, ब्यूरो, नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा स्वीकार किए जाने के बाद उत्तर भारत में विरोध की लहर तेज हो गई है। केंद्र सरकार की सिफारिशों पर आधारित इस परिभाषा में केवल 100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाली भूमि को ही “पहाड़ी” माना जाएगा। पर्यावरण समूहों ने इस बदलाव को अरावली की रक्षा के खिलाफ एक बड़ा कदम बताते हुए कहा है कि इससे खनन और निर्माण का मार्ग पहले से अधिक खुल जाएगा।
अरावली: भूगर्भीय और पारिस्थितिक दृष्टि से अनमोल
अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे पुरानी भूगर्भीय शृंखलाओं में से एक है, जिसकी आयु लगभग 25 करोड़ वर्ष मानी जाती है। यह राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक करीब 692 किलोमीटर में फैली है।
इसकी प्रमुख भूमिकाएँ—
-
जल संरक्षण: दिल्ली-एनसीआर और आसपास के क्षेत्रों में भूजल का प्रमुख स्रोत।
-
जैव विविधता: तेंदुआ, नीलगाय, लोमड़ी, सैकड़ों पक्षियों और विविध वनस्पतियों का महत्वपूर्ण आवास।
-
जलवायु नियंत्रण: गर्मी और धूल-आंधियों से सुरक्षा, वायु गुणवत्ता सुधारने में मदद।
-
स्थानीय संस्कृति: कई समुदायों और धार्मिक परंपराओं का आधार।
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, अरावली का लगभग 40% हिस्सा पहले ही शहरीकरण और खनन से प्रभावित है। नई परिभाषा से यह खतरा और बढ़ सकता है।
नई परिभाषा का विवाद—2019 के आदेश में बदलाव
2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की व्यापक वैज्ञानिक परिभाषा स्वीकार की थी, जिसके आधार पर कई क्षेत्रों को संरक्षित घोषित किया गया था। नई परिभाषा को केंद्र सरकार “वैज्ञानिक, मापनीय और विवाद-मुक्त” बताती है, पर पर्यावरणविद इसे अरावली संरक्षण के कमजोर होने का संकेत मानते हैं।
विरोध प्रदर्शन: गुरुग्राम से जयपुर तक सड़क पर जनता
फैसले के बाद हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली और यूपी में व्यापक विरोध शुरू हो गया—
-
गुरुग्राम और फरीदाबाद: पर्यावरण समूहों का मार्च और नारेबाजी।
-
अलवर व जयपुर: स्थानीय निवासियों ने खनन माफिया और सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया।
-
दिल्ली: कई एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट के बाहर प्रदर्शन की चेतावनी दी।
प्रमुख पर्यावरणविद वल्लरी खानवलकर और अनिल सौदागर ने चेताया कि “100 मीटर से नीचे की पहाड़ियां सबसे अधिक जैव विविधता वाली हैं; इन्हें खतरे में डालना पूरे इकोसिस्टम को अस्थिर कर सकता है।”
सोशल मीडिया पर #SaveAravalli तेजी से ट्रेंड कर रहा है।
पक्ष और विपक्ष: तर्कों की दो धाराएँ
सरकार और समर्थकों के तर्क:
-
नई परिभाषा स्पष्ट है, इससे कानूनी विवाद कम होंगे।
-
केवल वास्तविक पहाड़ी क्षेत्र अरावली के तहत आएँगे, छोटे टीले नहीं।
-
खनन केवल गैर-अरावली क्षेत्रों में होगा, जिससे रोजगार बढ़ेगा।
-
विकास परियोजनाओं को गति मिलेगी।
विरोधियों के तर्क:
-
ऊँचाई आधारित परिभाषा अवैज्ञानिक है—अरावली की कई महत्वपूर्ण चोटियाँ 100 मीटर से कम हैं।
-
छोटे पहाड़ी क्षेत्र जैव विविधता के हॉटस्पॉट हैं, जो नष्ट हो सकते हैं।
-
हरियाणा में पहले ही 200+ खदानें सक्रिय; और 500 नई खदानें खुलने का खतरा।
-
जल संकट बढ़ेगा—दिल्ली के भूजल का 20% अरावली पर निर्भर है।
-
स्थानीय पंचायतों और समुदायों की भूमिका कमजोर पड़ेगी।
-
ISRO सैटेलाइट डेटा के अनुसार, अरावली का 60% जोखिम क्षेत्र अब असुरक्षित हो सकता है।
संभावित प्रभाव: पर्यावरण पर दीर्घकालिक चोट
नई परिभाषा लागू होने से संभावित असर—
-
खनन वृद्धि: हरियाणा-राजस्थान में अनियंत्रित खनन का दबाव।
-
जल संकट में तेज बढ़ोतरी: भूजल का क्षरण।
-
शहरी फैलाव: रियल एस्टेट लॉबी को फायदा, प्रदूषण में वृद्धि।
-
कानूनी संघर्ष: पर्यावरण समूह सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर कर सकते हैं।
भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार, 1980 से आज तक अरावली का वन आवरण 30% घट चुका है।

