संगठन, सोशल इंजीनियरिंग और युवाओं पर नया फोकस
ANC वार्ता, संपादकीय, लखनऊ।
उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अपनी सक्रिय मौजूदगी दर्ज कराने की तैयारी में दिख रही है। आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी ने जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है। हाल के महीनों में लखनऊ में आयोजित रैली की सफलता, बिहार विधानसभा चुनाव में एक सीट पर जीत और केरल के निकाय चुनावों में सात पार्षदों की विजय ने पार्टी नेतृत्व को नया आत्मविश्वास दिया है। इसी क्रम में बसपा सुप्रीमो बहन कुमारी मायावती और पार्टी के मुख्य राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर आकाश आनंद ने बैठकों का दौर तेज कर दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बसपा एक बार फिर अपने मूल संगठनात्मक मॉडल और सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले की ओर लौटती दिख रही है, लेकिन इस बार उसमें युवाओं और आधुनिक चुनावी रणनीति का तड़का भी लगाया जा रहा है।
लखनऊ रैली और बाहर के राज्यों से मिले संकेत
बीते समय में लखनऊ में हुई बसपा की रैली को पार्टी के लिए एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखा गया। लंबे समय बाद पार्टी की इस रैली में कार्यकर्ताओं की अच्छी उपस्थिति ने यह संदेश दिया कि बसपा का कोर कैडर अभी भी सक्रिय है। वहीं बिहार विधानसभा चुनाव में एक सीट पर जीत और केरल के निकाय चुनाव में सात पार्षदों की सफलता ने यह दिखाया कि बसपा सीमित संसाधनों के बावजूद कुछ क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाए रखने में सफल रही है।
पार्टी सूत्रों का मानना है कि इन्हीं परिणामों ने उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर नेतृत्व को नए सिरे से रणनीति बनाने के लिए प्रेरित किया है।
बूथ-स्तरीय मजबूती: “एक बूथ, पांच यूथ” अभियान
बसपा अब भाजपा की तर्ज पर बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। पार्टी ने “एक बूथ, पांच यूथ” अभियान शुरू करने की योजना बनाई है। इसके तहत हर बूथ पर कम से कम पांच युवा कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी, जो मतदाता संपर्क, सोशल मीडिया और स्थानीय मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभाएंगे।
पार्टी नेतृत्व का मानना है कि बिना बूथ-स्तर की मजबूती के किसी भी बड़े चुनाव में प्रभावी प्रदर्शन संभव नहीं है। इस अभियान के जरिए बसपा युवाओं को पार्टी से जोड़ने और उन्हें नेतृत्व की भूमिका में लाने की कोशिश कर रही है।
संगठनात्मक पुनर्गठन पर जोर
बसपा सुप्रीमो मायावती ने संगठन को लेकर सख्त रुख अपनाया है। पार्टी को विधानसभा और बूथ-वार नए सिरे से खड़ा करने के निर्देश दिए गए हैं। सूत्रों के मुताबिक, जिन मंडल प्रभारियों और पदाधिकारियों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा, उन्हें हटाया जा रहा है और उनकी जगह युवा व सक्रिय नेताओं को जिम्मेदारी दी जा रही है।
यह कदम बसपा के उस पुराने आरोप को दूर करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें पार्टी पर “स्थिर और निष्क्रिय संगठन” होने की बात कही जाती रही है।
भाईचारा कमेटियों की वापसी
बसपा एक बार फिर अपने पारंपरिक सोशल इंजीनियरिंग के मॉडल पर लौटती नजर आ रही है। इसके तहत मुस्लिम भाईचारा कमेटी, ओबीसी भाईचारा कमेटी सहित विभिन्न समुदायों तक पहुंचने के लिए भाईचारा कमेटियों का पुनर्गठन किया जा रहा है।
पार्टी का मानना है कि दलितों के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों को साथ लाए बिना उत्तर प्रदेश की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाना मुश्किल है। यही वजह है कि सामाजिक संतुलन को फिर से साधने की कोशिश तेज कर दी गई है।
ओबीसी और अल्पसंख्यक outreach
बसपा अब दलित वोट बैंक तक सीमित रहने के बजाय ओबीसी और मुस्लिम समुदायों पर विशेष फोकस कर रही है। इसके लिए गांव-गांव जाकर चौपालें लगाई जा रही हैं, जहां स्थानीय मुद्दों पर चर्चा के साथ पार्टी की नीतियों को समझाया जा रहा है।
पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश दिए गए हैं कि वे सीधे लोगों से संवाद स्थापित करें और जमीनी स्तर पर भरोसा बहाल करें। यह रणनीति उस दौर की याद दिलाती है, जब बसपा ने सामाजिक गठजोड़ के दम पर उत्तर प्रदेश की सत्ता तक का सफर तय किया था।
नेतृत्व में बदलाव और आकाश आनंद की भूमिका
बसपा नेतृत्व में भी एक अहम बदलाव देखने को मिल रहा है। मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को मुख्य राष्ट्रीय समन्वयक की जिम्मेदारी दी है। उत्तर प्रदेश में पार्टी की नई टीमें अब आकाश आनंद के इनपुट के आधार पर गठित की जा रही हैं, जिसमें युवाओं को प्राथमिकता दी जा रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह कदम बसपा में पीढ़ीगत बदलाव और भविष्य की नेतृत्व तैयारी का संकेत है।
सदस्यता अभियान से संगठन विस्तार
पार्टी को नए सिरे से मजबूत करने के लिए बसपा ने अगले छह महीनों तक एक विशेष सदस्यता अभियान चलाने की योजना बनाई है। इसका उद्देश्य नए समर्थकों को पार्टी से जोड़ना और निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय करना है।
कुल मिलाकर, बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर गंभीर और सुनियोजित तैयारी में जुटी दिख रही है। संगठनात्मक पुनर्गठन, बूथ-स्तरीय रणनीति, सामाजिक संतुलन और युवा नेतृत्व—इन सभी बिंदुओं पर एक साथ काम किया जा रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह नई रणनीति बसपा को उत्तर प्रदेश की सियासत में कितनी मजबूती के साथ वापस लाती है।

