ANC वार्ता, नई दिल्ली। राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि बड़े पद तक वही पहुँचते हैं जो संघर्ष, धैर्य और सादगी का मेल अपने साथ रखते हैं। सीपी राधाकृष्णन, जिन्हें अब देश का नया उपराष्ट्रपति चुना गया है, इसका जीता-जागता उदाहरण हैं।
तमिलनाडु की मिट्टी से निकला नेता
राधाकृष्णन का जन्म 1957 में तमिलनाडु की उस ज़मीन पर हुआ जहां मेहनतकश समाज की गहरी जड़ें हैं। वे गौंडर समुदाय से आते हैं, जिसे दक्षिण भारत में एक प्रमुख ओबीसी जाति माना जाता है। बचपन से ही उनका झुकाव सामाजिक और संगठनात्मक कार्यों की ओर रहा। यही कारण रहा कि वे जल्दी ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ गए।
संघ से संसद तक
राधाकृष्णन का सार्वजनिक जीवन किसी अचानक उछाल का परिणाम नहीं था, बल्कि वर्षों के धैर्य और संगठनात्मक कार्यों का नतीजा था।
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1998: पहली बार कोयंबटूर लोकसभा सीट से भाजपा के उम्मीदवार बने और शानदार जीत दर्ज की।
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1999: दोबारा इसी सीट से जीतकर दिल्ली की राजनीति में अपनी पहचान मजबूत की।
उनका स्वभाव कम बोलने वाला और काम ज़्यादा करने वाला माना जाता है। यही कारण है कि संसद में उन्होंने विकास और स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया।
राज्यपाल के रूप में संयमित भूमिका
राजनीतिक जीवन के बाद उन्हें संवैधानिक ज़िम्मेदारी मिली।
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2023: झारखंड के राज्यपाल बने।
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2024: महाराष्ट्र के राज्यपाल बने।
इस दौरान उन्होंने यह साबित किया कि संविधान के रक्षक के रूप में उनकी भूमिका किसी विवाद से परे है। अपने पूर्ववर्ती उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की तुलना में राधाकृष्णन ने हमेशा संतुलित और शांतिपूर्ण रवैया अपनाया।
उपराष्ट्रपति चुनाव: जब किस्मत ने दी बुलंदी
जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद यह पद रिक्त हुआ। एनडीए ने राधाकृष्णन को प्रत्याशी बनाया और विपक्ष ने तेलंगाना से बी. सुदर्शन रेड्डी को उतारा।
9 सितंबर 2025 का दिन ऐतिहासिक रहा—
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कुल 767 वोट पड़े।
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752 वैध घोषित हुए।
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राधाकृष्णन को 452 और रेड्डी को 300 वोट मिले।
इस तरह 152 मतों के अंतर से राधाकृष्णन ने जीत दर्ज कर ली और देश के 15वें उपराष्ट्रपति बन गए।
नेताओं की बधाई और जनता की उम्मीदें
परिणाम आते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कहा—
“सीपी राधाकृष्णन जी का अनुभव और संतुलित नेतृत्व भारतीय लोकतंत्र को और मज़बूत करेगा।”
विपक्षी उम्मीदवार सुदर्शन रेड्डी ने हार मानते हुए भी राधाकृष्णन को शुभकामनाएँ दीं और कहा कि वैचारिक लड़ाई जारी रहेगी।
कैसा है उनका व्यक्तित्व?
राधाकृष्णन को लेकर जानकार कहते हैं कि वे मृदुभाषी, सादगी पसंद और अनुशासित नेता हैं।
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मीडिया से कम संवाद करते हैं।
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विवादास्पद बयानों से हमेशा दूरी बनाए रखते हैं।
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संगठन और विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध रहते हुए भी संवैधानिक पदों पर संतुलन बनाए रखते हैं।
भविष्य की चुनौतियाँ
अब जब वे उपराष्ट्रपति पद पर आसीन हुए हैं, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी—
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राज्यसभा में सत्ता और विपक्ष के बीच संतुलन बनाना।
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संसद की गरिमा बनाए रखना और बहस को मर्यादा में रखना।
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लोकतंत्र की संस्था को और मज़बूत करना।
सीपी राधाकृष्णन का सफर किसी राजवंशीय राजनीति से नहीं, बल्कि मेहनत और संगठनात्मक अनुशासन से बना है। दक्षिण भारत की ज़मीन से उठकर वे अब उपराष्ट्रपति भवन तक पहुँच गए हैं। उनकी पहचान यह है कि वे ज़्यादा बोलने से पहले सुनते हैं और विवाद से पहले समाधान ढूँढ़ते हैं।
भारत अब देखेगा कि यह सादा और संतुलित नेता किस तरह देश की लोकतांत्रिक परंपराओं को और ऊँचाई देता है।

