वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट 2026 में खुलासा
INCवार्ता विशेष रिपोर्ट, नई दिल्ली।
वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब की हालिया वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट 2026 ने वैश्विक आर्थिक असमानता पर गंभीर और चिंताजनक तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, आय और संपत्ति के असमान वितरण के मामले में भारत दुनिया में सबसे ऊपर पहुंच गया है। देश की कुल संपत्ति का 65 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी के पास सिमट चुका है, जबकि शेष 90 प्रतिशत जनता सीमित संसाधनों में जीवन यापन करने को मजबूर है। यह स्थिति न केवल आर्थिक असंतुलन, बल्कि सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी बड़ा सवाल खड़ा करती है।
चौंकाने वाले आंकड़े: आय पर कुछ का कब्जा
रिपोर्ट के प्रमुख आंकड़े बताते हैं कि भारत में शीर्ष 10 प्रतिशत धनी वर्ग 58 प्रतिशत राष्ट्रीय आय पर नियंत्रण रखता है। इसके विपरीत, देश की सबसे गरीब 50 प्रतिशत आबादी के हिस्से में महज 15 प्रतिशत आय आती है। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि ऊपरी 1 प्रतिशत वर्ग के पास देश की लगभग 40 प्रतिशत संपत्ति केंद्रित है। रिपोर्ट के अनुसार, यह स्तर ब्रिटिश शासनकाल में देखी गई असमानता से भी अधिक है, जब औपनिवेशिक शोषण अपने चरम पर था।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इतनी अधिक संपत्ति का संकेंद्रण आर्थिक विकास की “ट्रिकल-डाउन” थ्योरी को भी सवालों के घेरे में खड़ा करता है। जब आय का बड़ा हिस्सा सीमित हाथों में केंद्रित होता है, तो उपभोग, निवेश और रोजगार सृजन पर इसका नकारात्मक असर पड़ता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और रिपोर्ट का दायरा
वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट 2026, इस श्रृंखला की तीसरी अनुक्रमिक रिपोर्ट है। इससे पहले 2018 और 2022 में रिपोर्ट प्रकाशित हो चुकी हैं। यह अध्ययन 200 से अधिक अंतरराष्ट्रीय विद्वानों के सहयोग से तैयार किया गया है। इसके प्रमुख संपादकों में विश्व-प्रसिद्ध अर्थशास्त्री लुकास चैंसेल और थॉमस पिकेटी शामिल हैं, जो पहले भी असमानता और पूंजीवाद पर अपने शोध के लिए जाने जाते हैं।
रिपोर्ट का दायरा केवल आय और संपत्ति तक सीमित नहीं है। इसमें जलवायु परिवर्तन का आर्थिक असमानता पर प्रभाव, लिंग आधारित विषमता, शिक्षा और कौशल की असमान पहुंच, तथा क्षेत्रीय विकास में अंतर जैसे नए आयामों को भी शामिल किया गया है। रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि असमानता अब केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि बहुआयामी सामाजिक संकट बन चुकी है।
भारत में असमानता के प्रमुख कारण
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बढ़ती असमानता के पीछे कई संरचनात्मक कारण हैं।
पहला, तकनीकी क्रांति और ऑटोमेशन के चलते पारंपरिक रोजगारों में कमी आई है, जिससे असंगठित क्षेत्र के श्रमिक सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।
दूसरा, श्रमिकों के लिए मजबूत सामाजिक सुरक्षा जाल का अभाव है। स्वास्थ्य, पेंशन और बेरोजगारी भत्ते जैसी सुविधाएं सीमित वर्ग तक ही सिमटी हुई हैं।
तीसरा, प्रगतिशील कर प्रणाली की कमजोरी। भारत में प्रत्यक्ष करों की हिस्सेदारी कम और अप्रत्यक्ष करों पर निर्भरता अधिक है, जिसका बोझ गरीब और मध्यम वर्ग पर disproportionately पड़ता है।
इसके अलावा, शिक्षा और कौशल विकास में असमान निवेश ने भी सामाजिक गतिशीलता को बाधित किया है। रिपोर्ट बताती है कि गरीब परिवारों के बच्चों के लिए उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा तक पहुंच अब भी एक बड़ी चुनौती है, जिससे पीढ़ीगत असमानता और गहरी होती जा रही है।
सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव
रिपोर्ट चेतावनी देती है कि इतनी अधिक असमानता सामाजिक स्थिरता और लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए खतरा बन सकती है। आय में भारी अंतर सामाजिक असंतोष, अविश्वास और राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देता है। जब विकास का लाभ समाज के बड़े हिस्से तक नहीं पहुंचता, तो आर्थिक वृद्धि भी टिकाऊ नहीं रह पाती।
विशेषज्ञों का मानना है कि असमानता का असर स्वास्थ्य, पोषण और जीवन प्रत्याशा पर भी पड़ता है। गरीब वर्ग न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि सामाजिक सेवाओं तक पहुंच के मामले में भी पीछे रह जाता है।
रिपोर्ट के सुझाव और आगे की राह
वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट 2026 ने भारत सहित सभी देशों के लिए कुछ ठोस सुझाव दिए हैं। इनमें संपत्ति कर और उत्तराधिकार कर को प्रभावी ढंग से लागू करना, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा पर निवेश बढ़ाना, तथा सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को व्यापक बनाना शामिल है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि जलवायु नीतियों को इस तरह डिजाइन किया जाना चाहिए कि उनका बोझ गरीब वर्ग पर न पड़े।
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यदि समय रहते समावेशी नीतियां नहीं अपनाई गईं, तो असमानता आर्थिक विकास की गति को ही धीमा कर देगी। भारत जैसे युवा आबादी वाले देश के लिए यह चेतावनी बेहद गंभीर है।
वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट 2026 ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत की विकास कहानी के पीछे एक गहरी और बढ़ती आर्थिक खाई छिपी है। अमीर-गरीब के बीच बढ़ता फासला केवल आंकड़ों का सवाल नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और भविष्य की स्थिरता से जुड़ा मुद्दा है। अब यह नीति-निर्माताओं पर निर्भर करता है कि वे इस चेतावनी को गंभीरता से लेते हुए ऐसी नीतियां अपनाएं, जो विकास को वास्तव में समावेशी बना सकें।

