ANCवार्ता, नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था Supreme Court of India ने सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म की पैरेंट कंपनी Meta Platforms तथा उसके लोकप्रिय ऐप WhatsApp को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि भारत में कारोबार करना है तो देश के संविधान, कानून और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सम्मान करना होगा। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि यदि किसी कंपनी को भारत का संवैधानिक ढांचा स्वीकार नहीं है, तो वह यहां काम करने के लिए बाध्य नहीं है।
यह टिप्पणी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही, डेटा गोपनीयता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत कोई ‘डिजिटल फ्री-फॉर-ऑल’ नहीं है, बल्कि यहां कानून के तहत ही हर गतिविधि संचालित होती है, चाहे वह किसी भी वैश्विक टेक कंपनी द्वारा क्यों न की जा रही हो।
“भारत कोई बाजार भर नहीं”
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि भारत केवल उपभोक्ताओं का विशाल बाजार नहीं है, बल्कि एक संप्रभु लोकतांत्रिक राष्ट्र है, जिसकी अपनी संवैधानिक मर्यादाएं हैं। अदालत ने कहा, “आप भारत में व्यापार कर रहे हैं, करोड़ों लोगों का डेटा संभाल रहे हैं, तो आपको यहां के कानूनों का पालन करना ही होगा। संविधान सर्वोपरि है।”
अदालत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब डेटा प्राइवेसी, यूजर ट्रैकिंग, कंटेंट मॉडरेशन और सरकार–कंपनियों के बीच टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है। न्यायालय ने संकेत दिया कि किसी भी कंपनी को यह अधिकार नहीं है कि वह अपने वैश्विक नियम भारत पर थोप दे।
डेटा गोपनीयता पर सख्त रुख
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नागरिकों की निजता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित मौलिक अधिकार है। अदालत ने कहा कि टेक कंपनियों को यह समझना होगा कि यूजर डेटा केवल व्यावसायिक संसाधन नहीं, बल्कि नागरिकों की निजी जानकारी है, जिसकी सुरक्षा राज्य और न्यायपालिका दोनों की जिम्मेदारी है।
पीठ ने सवाल उठाया कि क्या वैश्विक प्लेटफॉर्म्स भारत में वही मानक अपनाते हैं, जो वे यूरोप या अमेरिका में अपनाते हैं? यदि नहीं, तो यह भेदभाव स्वीकार्य नहीं हो सकता। अदालत ने यह भी कहा कि भारत में कानूनों का उद्देश्य डिजिटल इनोवेशन को रोकना नहीं, बल्कि उसे जिम्मेदार बनाना है।
“संविधान सर्वोच्च, शर्तें नहीं चलेंगी”
सुनवाई के दौरान अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि कोई भी निजी कंपनी भारत सरकार या न्यायपालिका को शर्तें नहीं बता सकती। “यह तय करना अदालत का काम है कि देश के नागरिकों के अधिकार कैसे सुरक्षित होंगे, न कि किसी विदेशी कंपनी का,” टिप्पणी में कहा गया।
कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि अगर किसी कंपनी को भारतीय कानूनों से परेशानी है, तो उसके पास विकल्प मौजूद हैं, लेकिन संविधान से समझौता नहीं हो सकता। इस टिप्पणी को Meta–WhatsApp के लिए एक स्पष्ट संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
सरकार का रुख
मामले में केंद्र सरकार की ओर से पेश वकीलों ने अदालत को बताया कि सरकार डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए पारदर्शी और निष्पक्ष नियम चाहती है। सरकार का कहना है कि नए आईटी नियमों का उद्देश्य सेंसरशिप नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करना है, ताकि फेक न्यूज, घृणा भाषण और निजता के उल्लंघन जैसी समस्याओं पर अंकुश लगाया जा सके।
सरकार ने यह भी कहा कि भारत में काम करने वाली सभी कंपनियों को समान नियमों का पालन करना होगा, चाहे वे घरेलू हों या विदेशी।
टेक इंडस्ट्री में हलचल
सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी के बाद टेक इंडस्ट्री में हलचल तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भारत में डिजिटल गवर्नेंस की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है। इससे एक ओर जहां यूजर्स के अधिकार मजबूत होंगे, वहीं दूसरी ओर वैश्विक कंपनियों को अपनी नीतियों में भारत-केंद्रित बदलाव करने पड़ सकते हैं।
अदालत की चेतावनी को यह संकेत भी माना जा रहा है कि आने वाले समय में सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म्स पर कानूनी शिकंजा और कस सकता है।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए तारीख तय करते हुए स्पष्ट किया कि वह डिजिटल अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों से किसी तरह का समझौता नहीं करेगी। अदालत ने कहा कि तकनीक का विकास जरूरी है, लेकिन वह संविधान के दायरे में ही होना चाहिए।
इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि भारत में कानून से ऊपर कोई नहीं—चाहे वह कितनी ही बड़ी वैश्विक टेक कंपनी क्यों न हो।

