अंतरराष्ट्रीय पूर्वोत्तर राजनीति राष्ट्रीय

मिजोरम : जहाँ सुकून 365 दिन रहता है!

पूर्वोत्तर का उज्ज्वल प्रदेश : मिज़ोरम और मीज़ो समाज की असाधारण जीवन-परंपराएँ

डॉ. अनुज। ANCवार्ता में पूर्वोत्तर मामलों के नियमित स्तंभकार

मिज़ोरम भारत के सेवन सिस्टर्स राज्यों में से एक अत्यंत विशिष्ट और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध प्रदेश है। सन 1972 तक यह असम राज्य का हिस्सा था और लुसाई हिल्स जिला कहलाता था। भारत के 53वें संविधान संशोधन द्वारा इसे भारत के 23वें (तत्कालीन केंद्र शासित) राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ। छोटे भूगोल के साथ मिज़ोरम ने शिक्षा और जनसंख्या सूचकांक पर देश में दूसरा स्थान हासिल कर यह सिद्ध किया है कि विकास केवल संसाधनों से नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन, सामूहिक चेतना और दूरदर्शी मूल्यों से होता है। प्रदेश के 85 फ़ीसदी से अधिक क्षेत्र में सदाबहार और अर्धसदाबहार वन पाए जाते हैं, जो इसे प्राकृतिक रूप से संपन्न और पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील बनाते हैं। मिज़ोरम के निवासी मीज़ो कहलाते हैं, परंतु ‘मीज़ो’ शब्द मात्र जातीय पहचान नहीं, बल्कि भाषा, संस्कृति, भूगोल और सामाजिक संरचना सभी को समेटने वाला व्यापक शब्द है। संवैधानिक रूप से मीज़ो आदिवासी समाज है, जिसकी कई उपशाखाएँ और उपसमूह हैं और यह विविधता मिज़ोरम की सांस्कृतिक गहराई को और समृद्ध करती है।

प्रत्येक देश की अपनी स्थापत्य परंपरा होती है और वह परंपरा वहां के जलवायु, सामाजिक आदतों और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार विकसित होती है। भारत इस दृष्टि से अद्वितीय है कि यहां सिंधु-घाटी की प्राचीन नगर व्यवस्था से लेकर मुगल व गोथिक डिज़ाइन तक और ब्रिटिश स्थापत्य से लेकर भारतीय वास्तु तक सभी शैलियों का जीवंत दर्शन मिलता है। नई दिल्ली का स्वरूप एडविन लुटियन की वास्तु-दृष्टि का परिणाम है, जिन्होंने राष्ट्रपति भवन, इंडिया गेट और संपूर्ण राज-प्रशासनिक ढांचे की योजना बनाई। राष्ट्रपति भवन की दीवारों पर स्थापित ‘साइलेंट बेल्स’ ब्रिटिश शासन की उस मानसिकता का प्रतीक थीं, जिसमें वे मानते थे कि उनका शासन बिना किसी शोर और विरोध के निर्बाध रूप से चलता रहेगा।

भारतीय वास्तु-शास्त्र में उत्तर-पूर्व दिशा अर्थात इशान-कोण अत्यंत पवित्र मानी गई है। यह दिशा प्रकाश, ऊर्जा, अध्ययन, साधना और पावनता का क्षेत्र है। यदि भारत को एक घर की तरह देखें तो मिज़ोरम इस घर का इशान-कोण है—जहाँ सूर्योदय उत्तर भारत की तुलना में पहले होता है, जहाँ जल तत्व की भरपूर उपस्थिति है, जहाँ पहाड़ों की ढलानें पानी को ठहरने नहीं देतीं और जहाँ प्रकृति स्वयं ऊर्जा का प्रवाह बनाए रखती है। भूगोल, प्रकृति और सांस्कृतिक चेतना का यह संयोजन मिज़ोरम को केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक दिशा-रेखा बनाता है।

भारतीय दर्शन में महिलाओं को सर्वोच्च स्थान दिया गया है—“यत्र नारी पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवताः”—किन्तु इसका वास्तविक और दैनिक जीवन में उपयोग मिज़ोरम में प्रत्यक्ष दिखाई देता है। मिज़ोरम लैंगिक समानता के मामले में देश के किसी भी आधुनिक महानगर से सदियों आगे है। यहाँ महिलाएँ परिवार, समाज, प्रशासन, व्यापार, शिक्षा, सभी क्षेत्रों में स्वाभाविक रूप से नेतृत्वकारी भूमिका निभाती हैं। राज्य का लैंगिक अनुपात राष्ट्रीय औसत से बेहतर है और महिलाओं के प्रति सम्मान एवं सुरक्षा सामाजिक प्रणाली का हिस्सा है, न कि कोई लागू किया गया कानून।

मिज़ोरम की सबसे बड़ी विशेषता इसका अनुशासन है। यदि कोई व्यक्ति पहली बार मिज़ोरम जाए और सड़कों पर चले, तो वह पाएगा कि यातायात व्यवस्था किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि आत्म-अनुशासन से चलती है। लोग अनावश्यक हॉर्न नहीं बजाते, ट्रैफिक नियमों का पालन करते हैं और सार्वजनिक जीवन में शांति बनाए रखते हैं। इसमें भूगोल का भी योगदान है, क्योंकि पहाड़ी इलाकों में सावधानी स्वतः विकसित होती है, पर उससे कहीं अधिक योगदान शिक्षा और सामाजिक संस्कारों का है।

मिज़ोरम का प्राकृतिक सौंदर्य इसकी पहचान है। हिमालय से उतरते घने पहाड़, सदाबहार वन, बादलों से भरी घाटियाँ और केले, सुपारी, आम, तेजपत्ता सहित अनेक पौधों की सुगंधित उपस्थिति इस प्रदेश को प्रकृति की गोद जैसा सुकून देती है। भारत के अनेक राज्यों में ‘सुकून’ समय-समय पर खोजने की वस्तु है, पर मिज़ोरम में वर्ष के 365 दिन सुकून जीवन का स्थायी तत्व है।

मिज़ोरम केवल भूगोल नहीं, अनुशासन नहीं, नारी-शक्ति नहीं—यह भारत का वह प्रदेश है जहाँ संस्कृति, आधुनिकता, प्रकृति और प्रगतिशीलता एक साथ साँस लेते हैं। भारत के विकास मॉडल में जिन बातों को आज ‘सस्टेनेबिलिटी’, ‘महिला सशक्तिकरण’, ‘स्वच्छता’ और ‘सोशल ऑर्डर’ कहा जाता है—मिज़ोरम उन्हें सदियों से मौन भाव से जी रहा है। भारत का यह इशान-कोण वास्तव में राष्ट्र के लिए प्रेरणा-कोण है—जहाँ से ज्ञान, प्रकाश, समभाव और नवोत्थान की ऊर्जा प्रवाहित होती है।

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