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पूर्वोत्तर भारत : विविधता, विकास और राष्ट्रीय एकता का जीवंत सेतु

पूर्वोत्तर केवल एक भूगोल नहीं है; यह भारत की एकता में विविधता का सबसे सशक्त और सुंदर उदाहरण है

ANCवार्ता, डॉ अनुज, स्तंभकार 

पूर्वोत्तर भारत देश का वह भूभाग है, जो सांस्कृतिक, भौगोलिक और सामाजिक दृष्टि से अद्वितीय है। सात मूल राज्यों—अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा—साथ ही 2014 में बने आठवें राज्य सिक्किम को मिलाकर यहां की पहचान ‘अष्टलक्ष्मी’ के रूप में की जाती है। हिमालय की गोद, घने वन, निर्मल नदियाँ, जनजातीय परंपराएँ, शिल्प कला, संगीत और बांस-संस्कृति इस क्षेत्र को उससे भी अधिक समृद्ध बनाती हैं जितना सामान्यतः राष्ट्रीय विमर्श में देखा जाता है। आज जब भारत ‘विकसित भारत’ के विज़न की ओर बढ़ रहा है, पूर्वोत्तर क्षेत्र अपनी रणनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक भूमिका को और अधिक मजबूती से स्थापित कर रहा है।

पूर्वोत्तर भारत की भौगोलिक स्थिति अत्यंत विशेष है। यह क्षेत्र देश के शेष भाग से केवल सिलीगुड़ी कॉरिडोर या ‘चिकन नेक’ के तौर पर पहचाने जाने वाले 22 किलोमीटर चौड़े भूभाग से जुड़ा है। इसके अलावा इसकी 90% से अधिक अंतरराष्ट्रीय सीमाएँ बांग्लादेश, भूटान, चीन और म्यांमार से लगती हैं। यह स्थिति पूर्वोत्तर को रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र बनाती है। इसलिए सड़कें, पुल, रेलवे लाइनें और सीमाई सुरक्षा ढांचे को मजबूत बनाना राष्ट्रीय प्राथमिकता रहा है।

हाल के वर्षों में केंद्र सरकार ने विशेष रूप से एक्ट ईस्ट पॉलिसी को बढ़ावा देकर इस क्षेत्र को दक्षिण-पूर्वी एशिया से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिकोणीय राजमार्ग, रूपई–हल्दिया जलमार्ग, बोगीबील पुल, धुबरी–फुलबाड़ी ब्रिज और भारत-बांग्लादेश सीमा से जुड़े इंटीग्रेटेड चेक पॉइंट्स इस दिशा में ठोस उदाहरण हैं। कनेक्टिविटी बढ़ने से व्यापार, पर्यटन और रोजगार को नई गति मिली है।

भारत का पूर्वोत्तर विविधताओं का अनुपम संगम है। यहां 160 से अधिक जनजातियाँ और सैकड़ों बोलियाँ/उपबोलियाँ हैं। ज़िंदगी के हर महत्वपूर्ण क्षण—जन्म, विवाह, फसल और उत्सव—को विशेष लोकनृत्यों और संगीत के साथ मनाया जाता है। असम का बीहू, मेघालय के वाहल-लुंग, नागालैंड का हॉर्नबिल फेस्टिवल, मिजोरम का चपचार कुट, मणिपुर का संगाई फेस्टिवल, त्रिपुरा का खासी-ग्रोमिया और सिक्किम का लोसार इस सांस्कृतिक विविधता की जीवंत मिसालें हैं।

पूर्वोत्तर की कला-कौशल की दुनिया भी उतनी ही अनूठी है। बांबू और केन (बांस और बेंत) की कला-शिल्प, हाथ से बने वस्त्र, गहने, बांस की मूर्तियाँ और पारंपरिक बुनाई इस क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाती हैं। खासकर असम का मुग़ा रेशम, मणिपुर की मोइरांग फ़ी, नागालैंड की हैंडलूम शॉल संस्कृति और मेघालय की बांस-बुनाई राष्ट्रीय और वैश्विक बाजार में पहचान बना रही हैं।

पूर्वोत्तर प्राकृतिक संसाधनों से अत्यंत समृद्ध है। यह क्षेत्र भारत के कुल जल संसाधनों का करीब 34%, देश की कोयला, लाइमस्टोन और हाइड्रो-पावर क्षमता का बड़ा हिस्सा और सर्वाधिक वन क्षेत्र से सुसज्जित है। अरुणाचल प्रदेश को भविष्य में “भारत की ऊर्जा राजधानी” कहा जाता है क्योंकि यहाँ हाइड्रो-पावर की अपार क्षमता है।

कृषि के क्षेत्र में चाय, अदरक, इलायची, अनानास, संतरा, काले चावल, ऑर्गेनिक मसाले और बांस की खेती इस क्षेत्र को खास पहचान देती है। असम की चाय अब भी भारत की वैश्विक साख का प्रतीक है। त्रिपुरा का रूबर, नागालैंड की ऑर्गेनिक खेती और मिजोरम की बाड़ी आधारित कृषि पद्धतियाँ स्थिर आर्थिक मॉडल के रूप में उभर रही हैं।

पर्यटन के क्षेत्र में पूर्वोत्तर देश और दुनिया के यात्रियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन चुका है। काजीरंगा, नामेरी, सिंगलिला, डिब्रू-सैखोवा, लोनार झील, तवांग, शिलॉन्ग, चेरापूंजी, द्ज़ुकोउ वैली, लोकतक झील जैसे स्थल आज विश्व पर्यटन मानचित्र पर अपनी जगह बना रहे हैं।

हालांकि पूर्वोत्तर केवल प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विविधता का जीवंत प्रतीक नहीं है; यह चुनौतियों से भी जूझता रहा है। दशकों तक चलने वाले उग्रवादी आंदोलन, जातीय तनाव, भौगोलिक कठिनाइयाँ, बेरोजगारी और अवसंरचना की कमी ने विकास को अपेक्षाकृत धीमा किया। कई क्षेत्रों में अब भी मोबाइल नेटवर्क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ पूरी तरह सुलभ नहीं हैं।

फिर भी, पिछले एक दशक में स्थिति तेजी से बदली है। बातचीत और समझौतों के माध्यम से कई उग्रवादी समूह मुख्यधारा में लौटे हैं। असम में शांति समझौतों ने स्थिरता लाई है। मणिपुर और नागालैंड में भी वार्ताएँ जारी हैं। केंद्र और राज्य सरकारों के संयुक्त प्रयास से सड़क, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को नए आयाम मिले हैं।

पूर्वोत्तर केवल एक भूगोल नहीं है; यह भारत की एकता में विविधता का सबसे सशक्त और सुंदर उदाहरण है। इसकी जनजातीय परंपराएँ, मातृसत्तात्मक समाज विशेषकर मेघालय और मिजोरम में, शांति प्रिय संस्कृति और प्रकृति के प्रति सम्मान भारतीय सभ्यता को और अधिक समृद्ध बनाते हैं।

आज भारत जिस दिशा में बढ़ रहा है—डिजिटल कनेक्टिविटी, पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास, सीमा सुरक्षा और सांस्कृतिक सह-अस्तित्व—पूर्वोत्तर इन सभी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। युवा प्रतिभाएँ खेल, साहित्य, सिनेमा, संगीत और उद्यमिता में राष्ट्रीय स्तर पर नाम कमा रही हैं। मैरीकॉम, हीमा दास, मीराबाई चानू, बॉम्बेला देवी जैसे खिलाड़ी प्रेरणा बन चुके हैं।

पूर्वोत्तर भारत देश की वह धरोहर है जिसे अब राष्ट्रीय पहचान में वह स्थान मिल रहा है जिसकी वह वास्तव में हकदार है। इसकी प्राकृतिक संपदा, सांस्कृतिक विविधता, सामरिक महत्त्व और विकास की असीम संभावनाएँ इसे भारत के वर्तमान और भविष्य का अहम स्तंभ बनाती हैं।

जब हम ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना करते हैं, तो पूर्वोत्तर उसका अनिवार्य और अत्यंत मूल्यवान भाग है—जहाँ प्रकृति, संस्कृति, परंपरा और आधुनिकता एक साथ आगे बढ़ने का सुंदर संदेश देती हैं।

(लेखक पूर्वोत्तर मामलों के जानकार हैं। )

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