जनजातीय महिलाओं के संघर्ष को मिला नया स्वर — आशा पारस फाउंडेशन की राष्ट्रीय संगोष्ठी में विद्वानों ने रखे विचार
ANC वार्ता ब्यूरो, भोपाल
आशा पारस फॉर पीस एंड हार्मनी फाउंडेशन, भारत द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी “जनजातीय आंदोलन में महिलाएँ” में देशभर के प्रमुख शिक्षाविदों, समाजशास्त्रियों और नीति विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। संगोष्ठी का आयोजन ऑनलाइन मोड में हुआ, जिसमें वक्ताओं ने जनजातीय समाज में महिलाओं की भूमिका को भारतीय संस्कृति और विकास की दृष्टि से नए सिरे से परिभाषित किया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता पूर्व कुलपति प्रो. आशा शुक्ला ने की।
प्रो. आर. के. शुक्ला, निदेशक, आशा पारस फॉर पीस एंड हार्मनी फाउंडेशन ने स्वागत उद्बोधन में कहा कि “भारत की आत्माकेवल शहरों में नहीं, बल्कि उन जंगलों में बसती है जहाँ जनजातीय महिलाएँ अपनी शक्ति से संघर्ष को संस्कृति में बदल देती हैं।”
उन्होंने कहा कि विकसित भारत की परिकल्पना तभी साकार होगी जब जनजातीय महिलाओं की आवाज़ को नीतियों और विमर्शों में स्थान दिया जाएगा।
प्रो. कुसुम त्रिपाठी, साहित्यकार एवं नारीवादी चिन्तक, ने अपने वक्तव्य में फूलो-झानो, बिरसा मुंडा की महिला सहयोगियों और नंदीग्राम की महिलाओं के उदाहरण देते हुए कहा कि “आदिवासी स्त्रियाँ केवल प्रतिरोध की नहीं, नैतिक पुनर्जागरण की वाहक हैं।”
डॉ. लक्ष्मीनारायण पयोधि, वरिष्ठ साहित्यकार और जनजातीय संस्कृति के अध्येता, ने कहा कि “आदिवासी महिलाएँ पर्यावरणीय न्याय की पहली दार्शनिक हैं। उनका ज्ञान आधुनिक विकास के लिए मार्गदर्शक बन सकता है।”
मुख्य अतिथि प्रो. रमेश मकवाना, समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष, सरदार पटेल विश्वविद्यालय, ने कहा कि “जनजातीय महिलाएँ इस देश की सांस्कृतिक धरोहर हैं, जिन्होंने संघर्ष में भी गरिमा बनाए रखी।”
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. आशा शुक्ला ने कहा कि जनजातीय महिलाएँ “सिर्फ भागीदार नहीं, बल्कि दिशा-निर्देशक रही हैं।” उन्होंने नीति निर्माण में महिलाओं के नाम पर भूमि और वन अधिकार सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
पहले तकनीकी सत्र में डॉ. सीमा अलावा, डॉ. जया फुकन, प्रो. देवाशीष देवनाथ और प्रो. दिवाकर सिंह राजपूत ने अपने विचार रखे।
डॉ. फुकन ने पूर्वोत्तर भारत के संदर्भ में कहा कि “जनजातीय महिलाएँ निर्णय प्रक्रिया में सशक्त रही हैं, पर आधुनिक नीतियाँ उनकी सांस्कृतिक भूमिका को सीमित कर रही हैं।”
प्रो. देवनाथ ने महिलाओं की भूमिका को “non-violent resistance की सांस्कृतिक दर्शन” बताया, जबकि प्रो. राजपूत ने “PARAS Model” प्रस्तुत करते हुए कहा कि भागीदारी, चेतना, सुधार, संगठन और सततता — ये पाँच आधार स्तंभ जनजातीय नारी नेतृत्व की आत्मा हैं।
दूसरे सत्र में बलदाऊ राम साहू, प्रो. वी. के. श्रीवास्तव, प्रो. कन्हैया त्रिपाठी, और प्रो. किशोर जॉन ने वक्तव्य दिए।
श्री साहू ने अपने मैदानी अनुभव साझा करते हुए कहा कि “जिस समाज की महिलाएँ जंगल की रक्षा करती हैं, वही समाज जीवित रहता है।”
प्रो. श्रीवास्तव ने कहा कि “जनजातीय महिला धरती की आवाज़ है — उसने इतिहास को रक्त से नहीं, चरित्र से लिखा।”
प्रो. कन्हैया त्रिपाठी ने कहा कि “नारी धरती की नाड़ी है — जब नारी सशक्त होती है, तो सभ्यता स्वस्थ होती है।”
प्रो. किशोर जॉन ने कहा कि जनजातीय आंदोलन केवल प्रतिरोध नहीं, बल्कि “नैतिक पुनर्निर्माण” का सशक्त उदाहरण हैं।
संगोष्ठी से जो मुख्य निष्कर्ष निकले, वे इस प्रकार रहे — जनजातीय महिलाएँ प्रतिरोध से अधिक पुनर्जागरण की वाहक हैं। नीति-निर्माण में जनजातीय महिलाओं की अनिवार्य भागीदारी सुनिश्चित हो। “Tribal Women’s Studies” और मौखिक परंपराओं के दस्तावेज़ीकरण हेतु शोध केंद्र स्थापित किए जाएँ। स्थानीय भाषाओं में लोकगीतों, कथाओं और महिला नेतृत्व की कहानियों को संरक्षित किया जाए। पर्यावरण और विकास नीतियों में लैंगिक संवेदनशीलता जोड़ी जाए।
कार्यक्रम का संचालन लव चावड़ीकर, डॉ सर्जना चतुर्वेदी ने किया और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रामशंकर द्वारा दिया गया।
संगोष्ठी का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि “जनजातीय महिला केवल संघर्ष का प्रतीक नहीं, बल्कि भारत के नैतिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की प्रेरणा है।”
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