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चांदी की कीमतें कैसे बढ़ीं?

 21 साल पहले 10 हजार रुपये किलो, 12 महीनों में 86 हजार से 4 लाख तक का सफर

स्पेशल डेस्क | बिज़नेस डायरी
भारत में चांदी की कीमतों ने इतिहास रच दिया है। जहां करीब 21 साल पहले चांदी महज 10 हजार रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास मिल जाया करती थी, वहीं अब इसकी वायदा कीमतें पहली बार चार लाख रुपये प्रति किलो के स्तर को छू चुकी हैं। वैश्विक अनिश्चितता, औद्योगिक मांग और भू-राजनीतिक तनावों के बीच चांदी एक बार फिर निवेशकों की पसंदीदा धातु बनकर उभरी है।

वैश्विक उथल-पुथल का सीधा असर भारत पर

दुनियाभर में आर्थिक अस्थिरता, युद्ध, महंगाई और तकनीकी बदलावों के दौर में सोने के साथ-साथ चांदी भी सुरक्षित निवेश के विकल्प के रूप में उभरी है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में आई तेजी का असर भारतीय बाजार पर भी पड़ा। भारत चांदी का बड़ा आयातक है, ऐसे में वैश्विक कीमतों और रुपये की कमजोरी का सीधा असर घरेलू भावों पर पड़ा है।

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा वैश्विक हालात को देखते हुए निकट भविष्य में चांदी की कीमतों में बड़ी गिरावट की संभावना कम ही नजर आती है।

भारत में चांदी की कीमतों का ऐतिहासिक सफर

1980 का दशक: भरोसे का निवेश

1980 के दशक में चांदी ग्रामीण भारत के लिए सुरक्षित निवेश मानी जाती थी। किसान फसल के अच्छे समय में चांदी खरीदते और सूखे या जरूरत के वक्त इसे बेचते थे। इस दौर में चांदी की कीमतों में औसतन 10 से 12 प्रतिशत सालाना बढ़ोतरी देखी गई।

1990 का दशक: ठहराव का समय

आर्थिक उदारीकरण के बाद निवेशकों का रुझान शेयर बाजार और सोने की ओर बढ़ा। इसका असर चांदी पर पड़ा और इसकी कीमतें लगभग स्थिर रहीं। इस दशक को चांदी के लिए मंदी का दौर माना जाता है।

2000 का दशक: तीन गुना उछाल

2008 के वैश्विक वित्तीय संकट ने चांदी को “सेफ हेवन” एसेट बना दिया। इस दौर में निवेशकों ने जोखिम से बचने के लिए चांदी में पैसा लगाया। 2000 से 2010 के बीच चांदी की कीमतें करीब तीन गुना तक बढ़ गईं।

2011–2020: अस्थिरता का दौर

2011–12 में चांदी ने ₹57,316 प्रति किलो का रिकॉर्ड स्तर छुआ। इसके बाद कीमतों में गिरावट आई और 2015 तक भाव ₹40 हजार से नीचे चले गए। इस पूरे दशक में चांदी की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला।

2020–2026: ‘ऊर्जा धातु’ का युग

कोरोना महामारी के बाद दुनिया ने स्वच्छ ऊर्जा और तकनीक की ओर तेज कदम बढ़ाए। सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, 5जी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में चांदी की मांग तेजी से बढ़ी। 2023 से 2026 के बीच महज तीन वर्षों में चांदी की कीमतें करीब छह गुना तक बढ़ गईं।

एक साल में 86 हजार से 4 लाख तक का सफर

चांदी की कीमतों में असली उछाल जनवरी 2025 से शुरू हुआ। उस समय चांदी करीब 86 हजार रुपये प्रति किलो के आसपास थी। यह दौर वैश्विक अनिश्चितताओं का था—अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के बाद नीतिगत बदलाव, डॉलर में उतार-चढ़ाव और अंतरराष्ट्रीय तनाव चरम पर थे।

यदि किसी निवेशक ने जनवरी 2025 में 86 हजार रुपये में एक किलो चांदी खरीदी होती, तो आज उसकी कीमत करीब चार लाख रुपये हो चुकी होती। यानी महज 12 महीनों में निवेश पर कई गुना रिटर्न।

2025–26 में तेजी की बड़ी वजहें

1. औद्योगिक मांग में विस्फोट

आज वैश्विक चांदी की 50 प्रतिशत से ज्यादा मांग गहनों से नहीं, बल्कि उद्योगों से आती है। सौर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मेडिकल उपकरण, इलेक्ट्रिक वाहन और सेमीकंडक्टर उद्योग में चांदी की भूमिका अहम हो गई है।

2. रुपये की कमजोरी

भारत चांदी का बड़ा आयातक है। डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से आयात महंगा हुआ, जिसका असर सीधे घरेलू कीमतों पर पड़ा।

3. वैश्विक आपूर्ति में कमी

चांदी की खदानों से उत्पादन सीमित है, जबकि भविष्य की तकनीकों में इसकी खपत लगातार बढ़ रही है। चीन ने इस जरूरत को भांपते हुए कोरोना काल से पहले ही चांदी का आयात बढ़ा दिया था, जो अब रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है।

4. ‘क्रिटिकल मिनरल’ का दर्जा

नवंबर 2025 में अमेरिका ने चांदी को अपनी ‘महत्वपूर्ण खनिज’ यानी क्रिटिकल मिनरल्स की सूची में शामिल किया। इसके बाद वैश्विक बाजारों में चांदी की रणनीतिक मांग और बढ़ गई। चीन द्वारा निर्यात प्रतिबंधों की अटकलों और लंदन जैसे बाजारों में भौतिक चांदी की कमी ने कीमतों को और ऊपर धकेला।

5. वैश्विक अनिश्चितता और युद्ध

कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और इस्राइल-हमास संघर्ष जैसे घटनाक्रमों ने सोने-चांदी को रिजर्व एसेट के रूप में और मजबूत किया। संकट के समय निवेशक इन्हीं धातुओं की ओर रुख करते हैं।

आगे क्या कहता है बाजार?

बाजार विश्लेषकों के अनुसार, चांदी अब केवल कीमती धातु नहीं रही, बल्कि “औद्योगिक और रणनीतिक धातु” बन चुकी है। स्वच्छ ऊर्जा और नई तकनीकों में इसकी बढ़ती भूमिका को देखते हुए लंबी अवधि में इसकी मांग बनी रह सकती है।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि इतनी तेज बढ़त के बाद अल्पकालिक उतार-चढ़ाव संभव है। लेकिन मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में चांदी की कीमतों में बड़ी गिरावट की संभावना फिलहाल कम ही दिखाई देती है।

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