बदलती आवाज़, बदलता समाज
— स्तम्भकार डॉ. अनुज
आज देश और दुनिया में महिलाओं की आवाज़ पहले से कहीं अधिक मुखर हो चुकी है। अधिकार, सम्मान और बराबरी की मांग अब किसी एक वर्ग या क्षेत्र तक सीमित नहीं रही। घर की देहरी से निकलकर यह आवाज़ दफ्तरों, अदालतों और सरकार की नीतियों तक साफ सुनाई देने लगी है। अब यह समझ भी मजबूत हो रही है कि महिलाओं की भागीदारी का अर्थ केवल प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति है।
इसी संदर्भ में “सरपंच पति” जैसी प्रवृत्तियों पर न्यायालयों की सख्त टिप्पणियां लोकतंत्र की बुनियादी समझ को रेखांकित करती हैं। सत्ता किसी नाम या पहचान से नहीं, बल्कि अधिकार और जिम्मेदारी से जुड़ी होती है। जब महिलाएं केवल पद पर बैठाई जाती हैं और निर्णय कोई और लेता है, तो यह लोकतांत्रिक भावना के साथ अन्याय है। अदालतों का रुख इस बात का संकेत है कि अब ऐसे दिखावटी सशक्तिकरण को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
कार्यस्थलों पर भी बदलाव साफ नजर आता है। सरकारी और निजी संस्थानों में इंटरनल कंप्लेंट कमेटियों के सक्रिय होने से महिलाओं के लिए शिकायत दर्ज कराने और न्याय की उम्मीद करने का रास्ता पहले से कहीं आसान हुआ है। पहले जहां दबाव, डर और बदनामी की आशंका महिलाओं को चुप करा देती थी, वहीं अब उनकी बात सुने जाने, जांच होने और कार्रवाई की संभावना मजबूत हुई है। यह एक स्पष्ट संदेश है कि महिलाओं की गरिमा से जुड़ा कोई भी मामला अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामलों में सरकार का रुख भी पहले की तुलना में अधिक सख्त होता दिख रहा है। त्वरित कार्रवाई और कानून का भय अपराधियों के लिए चेतावनी बन रहा है। प्रशासन की सक्रियता और समाज का बढ़ता समर्थन यह दर्शाता है कि महिला सुरक्षा अब केवल चर्चा का विषय नहीं, बल्कि प्राथमिकता बनती जा रही है। उत्तर प्रदेश में महिला सुरक्षा को लेकर किए गए प्रयासों और हिंसा में कमी के दावे इसी दिशा में बदलाव का संकेत देते हैं।
सांस्कृतिक सोच और स्त्री का सम्मान
भारत की सांस्कृतिक परंपरा में स्त्री का स्थान हमेशा विशेष रहा है। यहां स्त्री को परिवार की धुरी के साथ-साथ शक्ति का प्रतीक माना गया है। “यत्र नारि पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवता” जैसी पंक्तियां केवल धार्मिक भाव नहीं, बल्कि समाज को यह याद दिलाने वाला संदेश हैं कि जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां समृद्धि और सकारात्मकता बढ़ती है। हमारे पुरातन ग्रंथों और परंपराओं में स्त्रियों को बराबरी का दर्जा देने की झलक मिलती है, जो कई अन्य सभ्यताओं की तुलना में कहीं अधिक प्रगतिशील दृष्टि को दर्शाती है।
आज की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सम्मान की यह भावना केवल भाषणों और नारों तक सीमित न रहे, बल्कि व्यवहार में उतरे। क्योंकि जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं, तो केवल उनका जीवन नहीं बदलता—पूरा समाज आगे बढ़ता है। इसी बदलाव की एक जीवंत तस्वीर पूर्वोत्तर राज्य मिज़ोरम में देखने को मिलती है।
मिज़ोरम: जहां सशक्तिकरण जीवन का हिस्सा है
मिज़ोरम की राजधानी आइजॉल में कदम रखते ही यह महसूस होता है कि यहां महिलाएं केवल सहायक भूमिका में नहीं, बल्कि कामकाज की मुख्य धारा में हैं। दोपहिया टैक्सी यहां आम परिवहन का हिस्सा है और शहर में जगह-जगह बाइक टैक्सी स्टैंड दिखाई देते हैं। इन स्टैंड्स पर महिला टैक्सी ड्राइवरों की मौजूदगी इस बात का मजबूत संकेत है कि महिलाएं आत्मनिर्भरता के साथ जिम्मेदार भूमिकाएं निभा रही हैं।
पहाड़ी शहर होने के कारण आइजॉल में चार पहिया वाहन चलाना कई बार चुनौतीपूर्ण होता है। संकरी सड़कें, ट्रैफिक और पार्किंग की समस्या के बीच बाइक टैक्सी तेज, सस्ती और व्यावहारिक सुविधा बन जाती है। ऑफिस जाना हो, बाजार पहुंचना हो या कोई जरूरी काम—बड़ी संख्या में लोग इसका सहारा लेते हैं। यह व्यवस्था शहर की जरूरतों के अनुरूप विकसित हुई है और इसमें महिलाओं की भागीदारी इसे और खास बनाती है।
आइजॉल की गलियों और बाजारों में महिलाओं की सक्रियता केवल परिवहन तक सीमित नहीं है। पंचर की दुकानों से लेकर ऑटोमोबाइल वर्कशॉप तक में महिलाओं की भागीदारी दिखाई देती है। यह दृश्य बताता है कि यहां श्रम और हुनर को लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि क्षमता के आधार पर देखा जाता है। रमरीकॉन जैसी सब्जी मंडियों में महिलाओं का नेतृत्व और उनकी आत्मविश्वास से भरी मौजूदगी शहर की आर्थिक संस्कृति का स्वाभाविक हिस्सा है।
मिज़ोरम में महिलाओं का मालिकाना हक भी सहज और स्वीकार्य नजर आता है। होटल, दुकानें, इलेक्ट्रिकल्स और हार्डवेयर जैसे व्यवसायों में महिलाएं न केवल काम कर रही हैं, बल्कि मालिक और निर्णयकर्ता की भूमिका में भी मजबूती से खड़ी हैं। यही बात मिज़ोरम को अलग पहचान देती है—जहां महिला सशक्तिकरण योजनाओं या नारों तक सीमित नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा है।
इन तमाम उदाहरणों के बीच मिज़ोरम यह संदेश देता है कि यदि समाज महिलाओं को भरोसा, अवसर और सम्मान दे, तो वे हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकती हैं। महिला सुरक्षा और समानता केवल कानून से नहीं, बल्कि सामाजिक सोच से मजबूत होती है। और यही सोच मिज़ोरम को आज भी देश के लिए एक प्रेरक उदाहरण बनाती है।

