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कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर के आरएसएस-अल कायदा वाले बयान से मचा बवाल

 भाजपा ने कहा—मानसिक दिवालियापन; कांग्रेस में भी बढ़ी दरार
श्वेता शर्मा , ANCवार्ता  ब्यूरो, नई दिल्ली

कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर के विवादित बयान ने राष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। टैगोर ने संघ की विचारधारा और कार्यशैली पर हमला बोलते हुए आरएसएस की तुलना अल-कायदा से कर दी, जिसके बाद भाजपा, आरएसएस और विहिप ने कांग्रेस पर तीखा प्रहार किया है। दूसरी ओर, कांग्रेस के भीतर भी इस बयान को लेकर गहरी असहजता और अंतर्विरोध खुलकर सामने आ रहे हैं।

विवाद की शुरुआत: दिग्विजय सिंह और टैगोर की तीखी टिप्पणी

विवाद तब शुरू हुआ जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने एक कार्यक्रम में आरएसएस की संगठनात्मक क्षमता की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनसे सीखना चाहिए कि जमीनी स्तर पर कैडर कैसे तैयार किया जाता है।
उनके इस बयान पर मणिकम टैगोर ने कड़ा विरोध जताया और सोशल मीडिया पर लिखा कि—
“आरएसएस नफरत फैलाने वाला संगठन है, अल-कायदा जैसा। इससे सीखने लायक कुछ नहीं। कांग्रेस की 140 साल की विरासत इससे कहीं ऊँची है।”

टैगोर के इस सीधे और विवादित बयान ने भाजपा व आरएसएस को कांग्रेस पर हमला करने का मौका दे दिया।

भाजपा-आरएसएस का पलटवार: ‘बौद्धिक और मानसिक दिवालियापन’

टैगोर के बयान पर सबसे पहले प्रतिक्रिया आई आरएसएस के वरिष्ठ नेता इंद्रेश कुमार की ओर से।
उन्होंने कहा कि—
“कांग्रेस अपनी चुनावी पराजयों से मानसिक रूप से टूट चुकी है। आरएसएस को आतंकवादी संगठन बताना कांग्रेस का बौद्धिक दिवालियापन है।”

उनके बयान के बाद भाजपा नेताओं ने मोर्चा संभाल लिया।

  • भाजपा सांसद जगदंबिका पाल ने कांग्रेस नेतृत्व से पूछा कि क्या यह पार्टी की आधिकारिक राय है? उन्होंने राहुल गांधी से टैगोर पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की।

  • भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा कि कांग्रेस राष्ट्रवादियों का लगातार अपमान कर रही है और जनता इसके जवाब में उसे बार-बार खारिज कर रही है।

  • विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने कांग्रेस को “राष्ट्र-विरोधी गिरोह” तक कह दिया।

भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस हिंदू संगठनों को निशाना बनाकर अपने “अल्पसंख्यक तुष्टीकरण” की राजनीति को आगे बढ़ा रही है, और यह बयान उसी सोच का हिस्सा है।

कांग्रेस में बढ़ती खींचतान: कौन किस तरफ?

टैगोर के बयान के बाद कांग्रेस के भीतर भी असहज स्थिति पैदा हो गई है।
पार्टी के कई दिग्गज नेताओं की प्रतिक्रिया एक-दूसरे से बिल्कुल अलग दिखी, जिससे कांग्रेस की आंतरिक खींचतान फिर उजागर हो गई:

  • राहुल गांधी ने दिग्विजय सिंह के बयान पर कहा— “ये शरारत है।”

  • शशि थरूर ने कहा कि पार्टी में अनुशासन ज़रूरी है और नेताओं को सावधानी से बोलना चाहिए।

  • पवन खेड़ा ने आरएसएस को गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की विचारधारा वाला संगठन बताते हुए कहा कि कांग्रेस का रुख स्पष्ट है—“नफरत के खिलाफ लड़ाई”।

इन बयानों से साफ झलक रहा है कि पार्टी में विचारधारा को लेकर एकरूपता नहीं है। वरिष्ठ नेताओं और युवा वर्ग के बीच मतांतर बार-बार सतह पर आ रहा है।

कांग्रेस कार्य समिति बैठक से पहले बढ़ी मुश्किलें

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब कांग्रेस की कार्य समिति (CWC) की महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है।
बैठक में संगठनात्मक बदलाव, 2026 के चुनावों की रणनीति और गठबंधन राजनीति पर चर्चा होनी है।
टैगोर के बयान ने बैठक से पहले पार्टी नेतृत्व पर अनावश्यक दबाव बढ़ा दिया है।

विश्लेषकों के अनुसार, यह घटनाक्रम कांग्रेस के भीतर वैचारिक स्पष्टता की कमी और नेतृत्व के प्रति बढ़ती बेचैनी का संकेत है।
साथ ही, भाजपा को कांग्रेस पर आक्रमण करने का एक और मौका मिल गया है, जिसे वह चुनावी माहौल में भरपूर भुनाएगी।

सियासी असर: किसे नुकसान, किसे फायदा?

राजनीति विशेषज्ञों का मानना है कि—

  • कांग्रेस इस विवाद से बचाव की स्थिति में आ गई है, क्योंकि पार्टी की अंदरूनी असहमति सार्वजनिक हो चुकी है।

  • भाजपा और आरएसएस इस बयान को हिंदुत्व पर हमले के रूप में पेश कर अपने समर्थक आधार को और मजबूत कर सकते हैं।

  • यह मामला कांग्रेस के “नैरेटिव मैनेजमेंट” की कमजोरियों को भी उजागर करता है, जिसमें कड़ी टकराव वाली टिप्पणियाँ अक्सर पार्टी को ही नुकसान पहुंचा देती हैं।

मणिकम टैगोर का बयान सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि कांग्रेस की वैचारिक दिशा, अनुशासन और सार्वजनिक छवि पर बड़ा सवाल बनकर उभरा है।
भाजपा-आरएसएस की ओर से तीखी प्रतिक्रिया और पार्टी के भीतर उभरते मतभेद बताते हैं कि यह विवाद जल्द थमता नहीं दिख रहा।

आगामी दिनों में कांग्रेस नेतृत्व टैगोर पर कोई कार्रवाई करता है या विवाद को शांत कर रणनीतिक चुप्पी अपनाता है—यह देखना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होगा।

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