दिल्ली में 2 घंटे तक चली गुपचुप मुलाकात के सियासी मायने
ANCवार्ता ब्यूरो, नई दिल्ली।
देश की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) की कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा से दिल्ली में करीब दो घंटे तक चली बंद कमरे की मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार गर्म कर दिया है। यह मुलाकात न तो पहले से सार्वजनिक की गई थी और न ही इसके बाद किसी औपचारिक बयान के जरिए इसके मकसद को स्पष्ट किया गया। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है—आखिर प्रशांत किशोर प्रियंका गांधी से क्यों मिले? क्या यह कांग्रेस की रणनीति में किसी बड़े बदलाव का संकेत है, या फिर आगामी चुनावों से पहले सियासी गणित को साधने की एक कोशिश?
अचानक हुई मुलाकात, बढ़ी सियासी हलचल
सूत्रों के मुताबिक, यह मुलाकात दिल्ली के एक निजी स्थान पर हुई, जहां दोनों नेताओं ने करीब दो घंटे तक बातचीत की। खास बात यह रही कि न तो कांग्रेस के किसी वरिष्ठ नेता को इसकी आधिकारिक जानकारी दी गई और न ही प्रशांत किशोर की ओर से कोई बयान सामने आया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतनी लंबी और गोपनीय बातचीत यूं ही नहीं होती—इसके पीछे जरूर कोई ठोस सियासी एजेंडा रहा होगा।
कांग्रेस और प्रशांत किशोर: पुराना रिश्ता, अधूरा अध्याय
यह पहला मौका नहीं है जब प्रशांत किशोर और कांग्रेस के बीच नजदीकियां चर्चा में आई हों। इससे पहले भी 2022 में प्रशांत किशोर ने कांग्रेस नेतृत्व के सामने संगठन और चुनावी सुधारों से जुड़ा एक विस्तृत प्रेजेंटेशन दिया था। हालांकि, तब बात आगे नहीं बढ़ पाई और पीके ने कांग्रेस से औपचारिक दूरी बना ली। इसके बाद उन्होंने बिहार में अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की और ‘जन सुराज’ अभियान के जरिए नई राजनीतिक जमीन तलाशने में जुट गए।
ऐसे में प्रियंका गांधी से यह मुलाकात एक तरह से उस अधूरे अध्याय की वापसी मानी जा रही है। सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अब एक बार फिर प्रशांत किशोर की चुनावी विशेषज्ञता का लाभ उठाने की तैयारी कर रही है?
प्रियंका गांधी की भूमिका क्यों अहम?
प्रियंका गांधी वाड्रा पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस की रणनीतिक राजनीति में एक अहम चेहरा बनकर उभरी हैं। संगठनात्मक फैसलों से लेकर जमीनी आंदोलनों तक, उनकी सक्रियता लगातार बढ़ी है। खासकर उत्तर भारत और हिंदी पट्टी में कांग्रेस की कमजोर होती पकड़ को मजबूत करने की जिम्मेदारी भी काफी हद तक प्रियंका के कंधों पर मानी जाती है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि कांग्रेस को आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में नया तेवर दिखाना है, तो उसे पारंपरिक तरीकों से बाहर निकलकर प्रोफेशनल रणनीति अपनानी होगी—और इसी संदर्भ में प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकार की भूमिका अहम हो सकती है।
क्या चुनावी रणनीति पर हुई बात?
सूत्रों की मानें तो इस मुलाकात में 2026–27 में होने वाले विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनावों की तैयारी को लेकर चर्चा हुई। खासतौर पर उन राज्यों पर फोकस रहा, जहां कांग्रेस लगातार कमजोर प्रदर्शन कर रही है। संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने, बूथ-लेवल मैनेजमेंट, सोशल मीडिया रणनीति और मतदाता नैरेटिव को लेकर भी बातचीत होने की संभावना जताई जा रही है।
हालांकि, कांग्रेस की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि पार्टी किसी व्यक्ति-विशेष पर निर्भर नहीं है, लेकिन साथ ही यह भी माना जा रहा है कि बदलते राजनीतिक दौर में विशेषज्ञ सलाह को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है।
प्रशांत किशोर के लिए क्या मायने?
दूसरी ओर, यह मुलाकात प्रशांत किशोर के लिए भी सियासी रूप से अहम मानी जा रही है। बिहार में ‘जन सुराज’ अभियान के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे पीके के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रासंगिक बने रहना जरूरी है। कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से संवाद उन्हें एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह मुलाकात किसी औपचारिक गठजोड़ की बजाय “रणनीतिक संवाद” का हिस्सा भी हो सकती है, जहां दोनों पक्ष एक-दूसरे की संभावनाओं और सीमाओं को टटोल रहे हों।
विपक्षी खेमे में भी नजर
इस मुलाकात के बाद विपक्षी दलों में भी हलचल देखी जा रही है। कुछ नेताओं का मानना है कि यदि कांग्रेस प्रशांत किशोर को किसी भूमिका में शामिल करती है, तो यह विपक्षी रणनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है। वहीं, कुछ इसे कांग्रेस की आंतरिक असमंजस का संकेत भी बता रहे हैं।
सियासी संकेत क्या कहते हैं?
फिलहाल इस मुलाकात को लेकर न तो कांग्रेस और न ही प्रशांत किशोर की ओर से कोई आधिकारिक बयान आया है। लेकिन राजनीति में खामोशी भी अक्सर बहुत कुछ कह जाती है। दो घंटे की यह गुपचुप मुलाकात साफ संकेत देती है कि कांग्रेस नए विकल्पों और नई रणनीतियों पर गंभीरता से विचार कर रही है।
अब देखना यह होगा कि यह बातचीत महज एक मुलाकात बनकर रह जाती है या आने वाले दिनों में कांग्रेस की राजनीति में किसी बड़े फैसले की भूमिका बनती है। फिलहाल, इतना तय है कि प्रियंका गांधी और प्रशांत किशोर की यह मुलाकात आने वाले समय में सियासी चर्चाओं का केंद्र बनी रहेगी।

