ANC वार्ता ब्यूरो, नई दिल्ली
भारतीय संत परंपरा में गुरुजन और महापुरुषों के बीच मतभेद और विवाद नए नहीं हैं, लेकिन उनका समाधान भी हमेशा संवाद, सहिष्णुता और आपसी सम्मान के माध्यम से होता आया है। हाल ही में वृंदावन के प्रसिद्ध संत जगद्गुरु रामभद्राचार्य और प्रेमानन्द महाराज के बीच चले विवाद ने पूरे संत समाज और भक्तों का ध्यान खींचा था। रामभद्राचार्य ने एक पॉडकास्ट में प्रेमानन्द महाराज के चमत्कारों को लेकर बयान दिया था, जिसके बाद सोशल मीडिया पर उनके अनुयायियों में गुस्सा देखा गया। लेकिन अब इस विवाद के शांत होने की उम्मीदें जाग उठी हैं, क्योंकि रामभद्राचार्य ने संकेत दिए हैं कि वे प्रेमानन्द महाराज को सार्वजनिक मंच पर गले लगाएंगे और सभी गलतफहमियों को खत्म करेंगे।
विवाद की शुरुआत
करीब दो सप्ताह पहले जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने एक पॉडकास्ट बातचीत में प्रेमानन्द महाराज के चमत्कारों को नकारते हुए कहा था कि वे उन्हें किसी प्रकार का दैवी चमत्कार नहीं मानते। उन्होंने संस्कृत और वेदांत की दृष्टि से यह तर्क दिया कि संत का मूल्यांकन उसके कर्म, वाणी और आचरण से होना चाहिए, न कि केवल अनुयायियों द्वारा फैलाए गए किस्सों से। यह बयान जैसे ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, प्रेमानन्द महाराज के भक्तों ने कड़ा विरोध शुरू कर दिया।
फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर उनके अनुयायियों ने रामभद्राचार्य के खिलाफ प्रतिक्रियाएँ दीं और कहा कि यह एक संत के प्रति अपमान है। कुछ जगहों पर तो प्रदर्शन की भी बातें सामने आईं।
बढ़ता तनाव और संत समाज की चिंता
संत परंपरा में इस तरह के टकराव को समाज और धर्म के लिए शुभ संकेत नहीं माना जाता। यही कारण था कि कई बड़े संतों और अखाड़ा परिषद के प्रतिनिधियों ने पहल कर दोनों महापुरुषों को आमने-सामने बैठाकर विवाद सुलझाने की कोशिश की।
कई सूत्रों ने बताया कि हरिद्वार और वृंदावन में संत समाज की एक अहम बैठक हुई, जिसमें यह तय किया गया कि आपसी आरोप-प्रत्यारोप से बचते हुए संवाद स्थापित किया जाए।
सुलह का रास्ता
पिछले दिनों एक धार्मिक आयोजन में जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने संकेत दिए कि वे विवादों को खत्म करने के लिए तैयार हैं। उन्होंने अपने प्रवचन में कहा, “संत परंपरा में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए। यदि प्रेमानन्द जी मिलेंगे तो मैं उन्हें गले लगाऊँगा, क्योंकि संतों के बीच केवल प्रेम होना चाहिए, न कि कटुता।”
इस कथन ने माहौल को सकारात्मक बना दिया है। प्रेमानन्द महाराज की ओर से भी संकेत मिले हैं कि वे इस विवाद को और आगे नहीं बढ़ाना चाहते। उनके करीबियों ने कहा कि महाराजजी हमेशा एकता, प्रेम और सेवा की बात करते हैं, इसलिए वे भी किसी टकराव में विश्वास नहीं करते।
भक्तों में उत्साह
यह खबर सामने आते ही दोनों संतों के अनुयायियों में राहत की लहर दौड़ गई है। सोशल मीडिया पर अब वही भक्त, जो पहले गुस्से में थे, अब शांति और भाईचारे की बातें कर रहे हैं। कई श्रद्धालुओं ने लिखा कि अगर दोनों महापुरुष गले मिलते हैं, तो यह पूरे संत समाज और समाज में एक सकारात्मक संदेश होगा।
समाज और धर्म पर असर
धार्मिक विद्वानों का मानना है कि अगर यह विवाद लंबा खिंचता तो इसका नकारात्मक असर समाज पर पड़ सकता था। युवाओं और भक्तों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती थी। लेकिन अब यदि दोनों संत एक मंच पर मिलते हैं तो यह समाज को यह संदेश देगा कि संवाद और प्रेम से हर विवाद सुलझाया जा सकता है।
भविष्य की राह
जानकारों का कहना है कि अगले महीने होने वाले एक बड़े धार्मिक आयोजन में दोनों संतों की मुलाकात हो सकती है। संभावना है कि वहां वे एक-दूसरे को गले लगाकर विवाद को हमेशा के लिए समाप्त कर देंगे।
यदि ऐसा होता है तो यह न केवल दोनों संतों के अनुयायियों के लिए बल्कि पूरे भारत के धार्मिक समाज के लिए एक बड़ी घटना होगी।
रामभद्राचार्य और प्रेमानन्द महाराज का विवाद जहाँ एक ओर भक्तों में चिंता का कारण बना, वहीं अब सुलह की पहल ने उम्मीदें जगा दी हैं। आने वाले दिनों में यदि दोनों महापुरुष सचमुच गले मिलते हैं, तो यह भारतीय संत परंपरा की उस महान परंपरा को पुनर्जीवित करेगा, जिसमें भले ही मतभेद हों, लेकिन हृदय में सदैव एक-दूसरे के लिए सम्मान और प्रेम रहता है।

